अभी खत्म नहीं हुई मूंछों की लड़ाई

Baghpat Updated Mon, 22 Oct 2012 12:00 PM IST
बागपत। ‘मुच्छ नहीं तो कुच्छ नहीं’ ‘वो बैल क्या जो सिंघैल ना हो, और वो मर्द क्या जो मुच्छैल ना हो।’ इस तरह की कहावतें समाज में बहुत पहले से प्रचलित हैं। बड़ी-बड़ी मूछें रखने वाले लोग इनकी याद भी दिलाते रहते हैं। भले ही नई पीढ़ी चिकने चेहरे पर यकीन रखे लेकिन बागपत के चौधरियों को मूंछें आज भी जान से प्यारी हैं। यहां मूंछ आन बान शान की निशानी है। इसके लिए जान दे भी सकते हैं, और ले भी सकते हैं। ये मूंछ वाले लोग सफाचट चेहरों पर कहते हैं, इन चौधरियों की जुबानी ही सुनिये, लंबी मूंछों की कहानी....
पाली गांव के बीडीसी अपनी खड़ी मूंछों पर ताव देते हुए कहते हैं, मूंछें सच्चाई की पहचान हैं। चाहे घर हो या गांव, सबको अनुशासन में वही व्यक्ति रख सकता है, जिसकी मूंछे लंबी हों। चौधरी वही है, जो मूंछ रखता हो।
बड़ौत की पट्टी चौधरान निवासी अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा के प्रदेशीय मंत्री घनश्याम शर्मा अपनी मूछों को पुरखों की निशानी बताते हैं। उनकी हर पीढ़ी में मूंछ रही है, और यह परंपरा आगे भी चलती रहेगी। ये मूछ हमारी पहचान है। काठा गांव के महा सिंह मूछों को चौधराहट की निशानी बताते हैं। कहते हैं कि चेहरे पर रौब मूंछ से ही आता है। वो बैल ही क्या जो सिंघैल ना हो और वो मर्द क्या जो मुच्छैल ना हो। कहते हैं पंचायत में भी मूंछ वालों को ही पंच चुना जाता है। बिना मूंछों वाले नौजवान पर कौन यकीन कर सकता है? पाली के आशाराम शर्मा मूंछों को सिर्फ चेहरे का आकर्षण नहीं मानते हैं। उनकी नजर में ये बुजुर्गों की निशानी है। पुराना कस्बा के विष्णु शर्मा बताते हैं कि वे रामलीला में रावण का किरदार निभाते हैं। वे जब जोर से दहाड़ते थे, तो मूंछों से प्रभाव बढ़ जाता है। उनकी मूंछे दर्शकों को पसंद आने लगीं, इसलिए हमेशा के लिए चेहरे पर मूंछें रख लीं।
पुराना कस्बा के ही दुकानदार हरिओम महेश्वरी कहते हैं कि मूंछों के बिना चेहरा अजीब सा लगता है। मूंछें चेहरे का आकर्षण हैं। पाली गांव के आशाराम चौहान मूंछों को बुजुर्गों की पहचान बताते हैं हैं। काठा गांव के आशाराम कहते हैं कि जिसके चेहरे पर मूंछ होती है, उसे देखकर बीरबानी पल्ला कर लेती हैं। यह सम्मान देने के लिए होता है।

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