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चीनी मिल बंद, किसानों को गन्ने की मिठास से परहेज

Azamgarh

Updated Tue, 04 Sep 2012 12:00 PM IST
आजमगढ़। एक मात्र सहकारी चीनी मिल सठियांव के बंद होने से श्रमिकों को झटका लगा है। जिले के किसान भी इससे अछूते नहीं हैं। आलम है कि किसानों को भी अब गन्ने की मिठास से परहेज होने लगा है। जिले में गिरती गन्ने की खेती इस बात का उदाहरण है। पांच साल में गन्ने का रकबा 2689 हेक्टेयर घट गया । हालांकि रकबा बढ़ाने के लिए बाहर की निजी चीनी मिलें किसानों को गन्ने का अधिक रेट दे कर लुभाने में जुटी हैं। इसके बाद भी गन्ने का रकबा पूर्व के रिकार्ड को पार नहीं कर पा रहा है।
शासन की उपेक्षा और जनप्रतिनिधियों की अनदेखी से सठियांव सहकारी चीनी मिल पांच साल से बंद पड़ी है। मिल बंदी के समय चालू करने के लिए सत्ता और विपक्ष के नेताओं के बीच एक -दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप का खेल भी खूब खेला गया। इसके बाद भी मिल आज तक नहीं चल सकी। मिल के बंद होते समय वर्ष 2007-08 के पेराई सत्र में लगभग 16 हजार हेक्टेयर गन्ना का उत्पादन हुआ था, जो वर्ष वर्ष 2008-09 में घट कर 14 हजार और वर्ष 2009-10 में लगभग 11 हजार हेक्टेयर पहुंच गया। मिल के बंद होने पर जिले में रकबा घटने पर हर साल पेराई सत्र में घोसी सहकारी चीनी मिल और पड़ोसी जिले की दो निजी मिलों के बीच किसानों में अधिक से अधिक गन्ना खरीदने के लिए होड़ मची रहती है। निजी मिलों में अकबरपुर मिल , समौधा चीनी मिल ने पिछले साल 14 लाख कुंटल और घोसी सहकारी चीनी मिल ने चार लाख कुंटल गन्ने की खरीद की थी। निजी मिलों के अधिकारी नगद भुगतान कर किसानों से घोसी सहकारी चीनी मिल के सेंटरों से जुड़े किसानों का भी गन्ना ले जाने के लिए हर तरह के हथकंडे अपनाने में पीछे नहीं रहते हैं। निजी मिलों की पहल पर इधर पिछले तीन साल से गन्ने के रकबे में इजाफा लाने की कवायद की जा रही है।
इसके बाद भी पिछला रिकार्ड से अभी भी नीचे हैं। जिला गन्ना अधिकारी राजेश कुमार ने बताया कि सठियांव चीनी मिल बंद होने से गन्ने का जो रकबा घटता दिखाई दे रहा है, उसकी भरपाई निजी मिलों के जरिये पूरी करने का प्रयास किया जा रहा है। इधर किसानों का कहना है कि निजी मिले दूसरे जिलों की हैं। गन्ना भेजने और भुगतान लेने में परेशानी झेलनी पड़ती है। बंद पड़ी सठियांव चीनी मिल के आस-पास के सठियांव, सुराई, अबारी आदि गांवों के किसान दलजीत यादव, सबई यादव, लालचंद, विनोद, विनय यादव, चंद्रभूषण का कहना है कि मिल के रहते कभी गन्ने की ही फसल की कमाई से लड़कियों की शादी का खर्च निकल जाता था। आज मिल बंद होने से गन्ने की जगह धान की फसल बोकर किसान खून की आंसू बहा रहे हैं, जबकि गन्ने की फसल धान की फसल की अपेक्षा पानी की कम जरूरत पड़ती थी।
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