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यहां 23 अगस्त 1942 को लड़ी आजादी की जंग

Azamgarh Updated Tue, 14 Aug 2012 12:00 PM IST
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अतरौलिया। आजाद भारत में अतरौलिया में स्थित उस शहीद स्थल को भुला दिया गया। इन शहीदों की याद में बने शहीद स्तंभ और स्मारक आज उपेक्षित हैं। यही नहीं सेनानियों के परिवार और गांव भी बदहाल है।
23 अगस्त 1942 के अतरौलिया गोलीकांड में 13 रणबांकुरों शहीद हो गए। अतरौलिया थाने पर कब्जा करने के लिए बढ़या के जमुना सिंह के नेतृत्व में कोयलसा, अतरौलिया, नरियांव में वृहद बैठक का आयोजन किया गया था। सड़क से दूर गांवों में हुई कोयलसा और नरियांव की मीटिंग ऐतिहासिक रही। क्योंकि यहां फिरंगियों की फौज नहीं पहुंच पाई। अतरौलिया डाक बंगले के पास दलित बस्ती में तीसरी मीटिंग की जिम्मेदारी आजादी के दीवाने रमचरित्र सिंह को सौंपी गई थी। क्रांतिकारी नौजवानों की हिम्मत और उत्साह देख डाक बंगले के पास मीटिंग थी। उस समय क्रांतिकारी जमुना सिंह, मारकंडेय सिंह, कालिका सिंह आसपास के गांव दसांव, बांसगांव, सेखपुरा आदि से नौजवानों को बैठक में भाग लेने के लिए बुलाने गए थे। सेनानी सैकड़ों नौजवानों के साथ भौराजपुर बाग के पास पहुंचे कि अंग्रेजी फौज डाक बंगले पर चल रही सभा को नाकाम करने के लिए धमक पड़ी। अंग्रेजी फौज को देख क्रांतिकारी नौजवान भारत मां का नारा लगाने लगे। इस पर आगबबूला हुई अंग्रेजी फौज ने निहत्थे क्रांतिकारियों पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसानी शुरू कर दी। इसी गोलीबारी में 13 रणबांकुरे देवनाथ पांडेय, देवराज पांडेय, दानबहादुर सिंह, जमुना सिंह, कालिका सिंह, फूलबदन ब्रह्मचारी, पन्नू सिंह, राजवंत सिंह, रामनायक तिवारी, सत्याचरण सिंह, रामनयन सिंह शहीद हो गए।
आजादी के छह दशक बाद पूरा जिला जहां आजादी की वर्षगांठ मनाने की तैयारी में जुटा है। वहीं, अतरौलिया का शहीद स्थल और शहीदों के परिवार बदहाली की स्थिति में हैं। बसपा शासन में शहीद रामचरित्र सिंह की मूर्ति और सभी शहीदों की स्मृति में प्रतीक चिन्ह लगाने के लिए विधायक निधि से पांच लाख रुपए अवमुक्त किए गए। डाक बंगला परिसर में शिलान्यास भी किया गया। लेकिन पांच फीट दीवार और फाटक लगा कर इतिश्री कर दिया गया। न तो मूर्ति स्थापित की गई और न तो छत डाली गई। स्वतंत्रता सेनानी रामचरित्र सिंह के पौत्र योगेंद्र सिंह ने बताया कि हमारे परिवार के तीन लोगों ने देश की आजादी के लिए प्राणों की आहुति दी, लेकिन शासन-प्रशासन ने आज तक कुछ नहीं किया। गांव में जाने के लिए रास्ता तक नहीं है। शहीद स्थल को भी भुला दिया गया।

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