हालात से हारा स्वतंत्रता सेनानी का परिवार

Azamgarh Updated Mon, 06 Aug 2012 12:00 PM IST
आजमगढ़। जंग-ए-आजादी में अंग्रेजी हुकूमत से लोहा लेने वाले स्वतंत्रता सेनानी शुकदेव प्रसाद गुप्ता का परिवार आजाद भारत में बेहाल है। रोटी, कपड़ा और मकान के लाले पड़े हैं। सेनानी के पौत्र रिक्शा ट्राली खींच रहे हैं। सेनानी की विधवा शिमला देवी समेत परिवार में 23 सदस्य हैं। लेकिन फीस के अभाव में परिवार की नन्ही बेटी प्रीति ने दो साल तक स्कूल जाना ही बंद कर दिया था। आजादी के बाद जबतक शुकदेव प्रसाद जिंदा रहे पेंशन के सहारे परिवार का भरण- पोषण होता रहा। लेकिन उनके गुजरते ही पुत्र कमला प्रसाद गुप्ता का पूरा कुनबा हालात से लड़ते-लड़ते सड़क पर आ गया। पुश्तैनी मकान जर्जर हो कर गिर गया।

अपनी ही जमीन के लिए जंग जारी है
जिस भूखंड पर खंडहर में तब्दील मकान है, उसी के बगल में ग्राम समाज की जमीन है। ग्राम समाज की जमीन पर पिछले 20 साल से एक राजनेता के रिश्तेदार का कब्जा है, जो स्वतंत्रता सेनानी के परिवार के हिस्से की आबादी वाली जमीन को भी अपना होने का दावा करता है। न्यायालय में पिछले 20 साल से मुकदमा लंबित पड़ा है। जर्जर मकान को गिराकर दो साल पूर्व कमला प्रसाद गुप्ता ने पुनर्निर्माण कराने का प्रयास किया, तो तत्कालीन बसपा सरकार में पहुंच रखने वाले राजनेता के इशारे पर तत्कालीन एसडीएम सदर ने भवन निर्माण रुकवा दिया।

सदमा नहीं झेल सके
निर्माण रोके जाने का सदमा लगते ही हाल ही में दो मई 2012 को कमला प्रसाद गुप्ता का निधन हो गया। इसके बाद भी प्रशासन ने स्वतंत्रता सेनानी के परिवार की सुधि नहीं ली। मान की जंग जारी है।
परिवार का हाल
पति के निधन के बाद स्वतंत्रता सेनानी की पुत्र वधू शिमला देवी सात पुत्रों और पौत्र-पौत्रियों से भरे परिवार की गाड़ी जैसे-तैसे खींच रही हैं। सातों पुत्रों में चार की शादी हुई है और तीन अविवाहित हैं। बड़ा पुत्र अशोक रानी की सराय कस्बे में फोटोग्राफी का काम करता है, जो पुश्तैनी मकान के खंडहर में तब्दील हो जाने पर परिवार से अलग किराए के मकान में रहता है। विजय ठेला लगा कर वड़ापाव बेचता है। सूरज रिक्शा ट्राली खींचने को मजबूर है। जबकि अजय शादी विवाह में डीजे और लाउडस्पीकर बजाने का काम करता है। पंटू डीसीएम ड्राइवर है।
रोटी, कपड़ा और मकान के लाले पड़े
परिवार की मुखिया शिमला देवी का रोना है कि ससुर शुकदेव प्रसाद गुप्त ने देश को आजादी दिलाने में गोरी हुकूमत के छक्के छुड़ा दिए थे। आज आजाद भारत में परिवार को रोटी, कपड़ा और मकान के लाले पड़े हैं। भवन का निर्माण रोक दिए जाने से पूरा परिवार किराए के मकान में रहने को मजबूर है। न्यायालय और राजनीतिक दांवपेंच में फंसकर बेटों को कमाने-खाने से ही फुरसत नहीं। आर्थिक तंगी के चलते 12 साल की पौत्री प्रीति ने पिछले दो साल से स्कूल जाना बंद करा दिया था। इस साल कुछ लोगों के सहयोग से उसने रानी की सराय ब्लाक में खुले कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालय में छठवीं कक्षा में दाखिला लिया है। जबकि अन्य बच्चे चाह कर भी कान्वेंट स्कूलों से दूर परिषदीय विद्यालयों में सर्व शिक्षा अभियान की शोभा बढ़ा रहे हैं।

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