पुराने रिश्तों को भुनाने आए मुलायम

Azamgarh Updated Mon, 05 May 2014 05:30 AM IST
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आजमगढ़। ‘तन से इटावा के, मन से आजमगढ़ी..’ यह नारा समाजवादी पार्टी को तब देना पड़ा, जब मुलायम के आने के बाद यहां का चुनाव स्थानीय बनाम बाहरी बन गया था। पर अब मुलायम बाहरी के ठप्पे से उबर गए हैं। अब उनकी मौजूदगी का असर महापंडित राहुल सांकृत्यायन और कैफी आजमी की वैचारिक भूमि के अतिरिक्त आसपास की संसदीय सीटों के चुनावी समीकरणों पर भी पड़ने लगा है।
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मुलायम 1980 में लोकदल के प्रदेश अध्यक्ष बने तो उन्होंने चौधरी चरण सिंह के प्रभाव वाले पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बजाय पूर्वांचल को अपनी राजनीति का केंद्र बनाया। विश्राम राय जैसे खांटी समाजवादी नेताओं के दबदबे को आधार बनाकर उन्होंने पूर्वांचल भर में यादव समाज को गोलबंद कर एक नई राजनीतिक शक्ति बना दी। चरण सिंह के निधन के बाद इसी इलाके की बदौलत पार्टी में उनका दबदबा कायम रहा। आजमगढ़ से इसी प्रेम के कारण उन्होंने कल्पनाथ राय के विरोध के बावजूद आजमगढ़ में कमिश्नरी बनाई (कल्पनाथ राय मऊ में कमिश्नरी बनवाना चाहते थे)। इसके अलावा मेडिकल कालेज, कृषि विश्वविद्यालय, वेटनरी कालेज, बुनकर विपणन केंद्र, सभी सुविधाओं से युक्त महिला अस्पताल सहित बहुत कुछ बनवाया। इन्हीं पुराने रिश्तों की दुहाई देकर तीन दशक बाद मुलायम ने यहां से चुनाव लड़ने का जोखिम उठाया है। यह जानते हुए भी कि कि स्थानीय स्तर पर पार्टी में आतंरिक कलह चरम पर है। यहां तक कि जिले के दो मंत्रियों में बोलचाल तक बंद है। वोटर विधायकों से बुरी तरह खफा है।
जब मुलायम नामांकन करने आए तो उन्हें स्थानीय बनाम बाहरी के सवाल से टकराना पड़ा ही, अपमान तक झेलना पड़ा। शांत रहकर उन्होंने टकराव टाला। पर्चा दाखिल करने के बाद वह कुछ घंटे भी आजमगढ़ में नहीं रहे। शांत रहने की उनकी यह रणनीति कामयाब रही और आज उनकी उपस्थिति का असर दिख रहा है। अब उनके बाहरी होने का मुद्दा हवा हो चुका है। पार्टी की अंदरूनी कलह खत्म हो गई है और जनता उनकी पार्टी के विधायकों की सजा उनको देने को गलत मानने लगी है।
ठंडी सड़क के रहने वाले दुकानदार कमलेश यादव बेलौस कहते हैं- ‘सब मुखिया जी (मुलायम) के देखत बा, एमएलए लोगन क नाव पर एको वोट ना मिली।’ हंसापुर के साधु यादव भी इसी बात की पुष्टि करते हैं। वह कहते हैं-‘अब यादव बिरादरी की नाक का सवाल पैदा हो गया है, जो बहक रहे हैं, वे भी राह पर आ जाएंगे।’
आजमगढ़ से लड़ने के और भी लाभ हैं। जानकारों का कहना है कि यहां कई रसूखदार मदरसे हैं, जिनका अंदरूनी संचारतंत्र बेहद चुस्त है। आजमगढ़ में मुलायम की स्थिति मजबूत होने पर इस नेटवर्क के जरिये विश्वसनीय तरीके से उनकी बात पूरे समुदाय में पहुंच जाएगी। जानकारों का कहना है कि ऐसा बहुत हद तक हो भी रहा है। यही कारण है कि मुजफ्फरनगर दंगे से क्षुब्ध अल्पसंख्यकों के मन की बर्फ काफी हद तक पिघलने लगी है। मुबारकपुर के मदरसा अशरफिया के नायब नाजिम मौलाना इदरीस बस्तवी के मुताबिक पूर्वांचल में मुजफ्फरनगर दंगे का कोई असर नहीं है। यहीं के अरशद जमाल कहते हैं कि दंगे मुलायम ने तो कराए नहीं। हां, उसको रोकने में कुछ ढिलाई जरूर हुई, तो इसके लिए मुलायम ने माफी भी तो मांग ली।
सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर 1974 में एमएलए का चुनाव लड़ चुके फजलुर्रहमान अंसारी के मुताबिक पूर्वांचल में मुजफ्फरनगर का असर नहीं है। हां, चुनाव आयोग के रवैए को लोग भेदभावपूर्ण जरूर मानने लगे हैं। एक तरफ आजम खां पर लगी पाबंदी और वैसे ही मामलों में भाजपा के गिरिराज सिंह और अमित शाह को ढील देने से मुस्लिम समाज नाराज है। इससे सपा के प्रति सहानुभूति पैदा हुई है। वाराणसी, आजमगढ़ और विंध्य मंडल की 12 में से छह सीटों पर सपा को इसका फायदा मिल सकता है।
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