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49 साल बाद शुरू हुई चकबंदी, ग्रामीणों ने शुरू किया विरोध

Varanasi Bureauवाराणसी ब्यूरो Updated Mon, 20 May 2019 11:07 PM IST
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अहरौला। बूढ़नपुर तहसील क्षेत्र की ग्राम सभा गहजी में 1970 के दशक में चकबंदी शुरू हुई थी। लेकिन वह पूरी नहीं हो पाई क्योंकि गांव के विक्रमा सिंह और अन्य ने चकबंदी में खामियों के चलते 1974 में हाईकोर्ट से स्टे ले लिया। बाद में पैरवी कमजोर पड़ने पर हाईकोर्ट ने सरकारी दलीलों के चलते ग्रामीणों के स्टे आर्डर को रद्द कर दिया। इसके बाद डीडीसी आजमगढ़ के नेतृत्व में गहजी की चकबंदी की कमान सौंप दी लेकिन एक बार फिर से ग्रामीणों ने इसकी शुरुआत होने की विरोध कर दिया है। इसे लेकर सोमवार को ग्रामीण डीडीसी से मिले।
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बीते 18 मई शनिवार को चकबंदी की टीम ने गहजी गांव पहुंचकर नापी का काम शुरू किया लेकिन जब ग्रामीणों को यह पता चला कि चकबंदी मात्र खाना पूर्ति है। इससे कुछ व्यक्तिगत विशेष को फायदा होगा क्योंकि इस चकबंदी में न तो ग्रामीणों के बिखरे हुए चक की मालीयत मिलेगी और ना तो चकमार्ग का प्रावधान होगा, ना तो जल निकासी की कोई व्यवस्था होगी। मात्र एक दूसरे से लड़ाने का काम चकबंदी से होगा। इसके बाद ग्रामीणों ने चकबंदी का विरोध करना शुरू कर दिया और चकबंदी न होने देने की बात लेखपाल कानूनगो से कही। इसके बाद सोमवार को दर्जनों ग्रामीण अपना विरोध दर्ज कराने डीडीसी कार्यालय पहुंचे और वकील के जरिये विरोध दर्ज कराया। इस पर डीडीसी ने 25 मई को इस मामले में बैठ कर बिंदुवार समीक्षा कर निर्णय लेने का आश्वासन दिया है।
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चकबंदी अपूर्ण होने से किसानों की समस्याएं
ग्रामसभा गहजी की चकबंदी अपूर्ण की स्थिति में किसानों को धारा 52 का प्रकाशन चकबंदी ऑफिस से कराना पड़ता है जिसकी नकल लेने में लेखपाल हफ्तों किसानों को चकबंदी ऑफिस का चक्कर लगवाते हैं। ऊपर से 300 से 500 रुपये का सुविधा शुल्क भी देना पड़ता है। विभिन्न बैंकों से किसी प्रकार का लोन करवाने पर नकल की गारंटी देने पर समस्या आती है क्योंकि किसानों का मूल नंबर कहीं और जोत कहीं और होती है। इससे बैंक गारंटी देने में कतराते हैं। किसानों के लिए खेतों में नाली अन्य की सुविधा उपलब्ध नहीं है जिससे किसान खासे परेशान हैं। उन्हें नकल लेने के लिए आजमगढ़ तक दौड़ भाग चकबंदी ऑफिस तक करनी पड़ती है।

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