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हरितालिका तीज व्रत आज, महिलाओं ने पूरी की आवश्यक तैयारियां

Lucknow Bureau Updated Tue, 11 Sep 2018 11:32 PM IST
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अंबेडकरनगर। हरितालिका व्रत (तीज) का प्रसिद्ध पर्व 12 सितंबर बुधवार को को मनेगा। सौभाग्यवती स्त्रियां अपने अखंड सौभाग्य के लिये और कन्याएं अपने भावीजीवन में सुयोग्य जीवन साथी मिलने की कामना से इस कठिन व्रत को पूरी श्रद्धा व विश्वास के साथ रखती हैं। इस पर्व में भगवान शिव और माता पार्वती के पूजन का विधान है। व्रत धारण करने वाली स्त्रियां व कन्याएं मिट्टी से भगवान शिव पार्वती की मूर्ति निर्मित कर स्थापित करती हैं, और विधि विधान से पूजन अर्चन करती हैं। महिलाएं पूजन के उपरांत सुहागिन ब्राहामिणी को दान देकर सुख समृद्धि की कामना भी करती हैं।
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हरितालिका व्रत को लेकर व्रतधारी महिलाओं ने तैयारियां एक दिन पहले ही पूरी कर लीं। बुधवार को तीज व्रत पूरी आस्था के साथ मनेगा। सुहागिन महिलाएं जहां अपने अखंड सौभाग्य के लिए भगवान शिव माता पार्वती की आराधना करती हैं, वहीं युवतियां व्रत रखकर सुयोग्य वर मिलने की कामना करेंगी।

टांडा नगर के पंडित काशी मिश्र बताते हैं कि यह व्रत भाद्रपद शुक्ल पक्ष तृतीया तिथि पर मनाया जाता है। व्रत धारण करने वालों के लिये इस दिन चंद्र दर्शन वर्जित है। यदि अनचाहे व अनजाने में देख लें तो मंत्र का जाप करना चाहिए। बताया कि भगवान शिव व माता पार्वती को धूप, दीप, नैवेद्य, सोलह श्रृंगार, जंबूरी नीबू, चंदन, पुष्प, नारियल, सुपाड़ी, लौंग, अनार, नारंगी सहित ऋतु फल आदि अर्पित कर पूजन अर्चन करना चाहिये। कहा कि बुधवार की शाम पौने 5 बजे से रात 8 बजकर 11 बजे तक पूजन करने के लिये उत्तम मुहूर्त है।

बताया कि इस व्रत के पीछे एक कथा प्रचलित है कि राजा हिमाचल से महर्षि नारद ने भगवान विष्णु के साथ उनकी पुत्री पार्वती के विवाह का प्रस्ताव रखा। राजा हिमाचल अति प्रसन्न होकर प्रस्ताव स्वीकार कर लिए, जबकि पार्वती ने शिव को पति के रूप में वरण कर लिया था। जब यह जानकारी उनको हुई तो परेशान हो जाती हैं।

पार्वती जंगल में नदी के किनारे भगवान शिव की प्रतिमा निर्मित करती हैं, और उसे स्थापित कर घोर तपस्या करती हैं। तब भगवान शिव प्रसन्न होकर उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार करने का आशीर्वाद देते हैं। राजा हिमाचल अपनी पुत्री पार्वती को महल ले आये और शिव के साथ विवाह करने का निश्चय किया। इस व्रत को धारण करने के उपरांत स्वर्ण, चांदी, तांबा या बांस के पात्र में अन्न भरकर ब्राह्मण को दान देने के बाद ही व्रत का पारण करना चाहिये। इस व्रत में दही, मिठाई, फल आदि भी वर्जित है।

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