फूलों की खेती से किसान हो रहे मालामाल

AmbedkarNagar Updated Sat, 23 Nov 2013 05:41 AM IST
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अंबेडकरनगर। फूलों की खेती से जिले के किसान मालामाल हो रहे हैं। वह दौर अब बीते दिनों की बात हो चुकी है, जब किसान सिर्फ परंपरागत खेती तक सीमित थे। गेंदे, गुलाब व ग्लेडियोलस की खेती किसानों को खूब मुनाफा दे रही है। इसमें ग्लेडियोलस का नंबर अव्वल है। फूलों के साथ ही केले जैसे फलों की खेती भी जिले में तेजी से अपने पांव पसार रही है। कारण यह कि इसमें भी कम लागत में अधिक मुनाफा मिलने की गारंटी ज्यादातर बनी रहती है। जिले में ऐसे भी किसान हैं, जिनके फूलों की खपत स्थानीय बाजार में न हो पाने के कारण उन्हें वाराणसी की मंडी में भेजना पड़ता है।
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परंपरागत खेती तक ही सीमित रहना अब गुजरे दिनों की बात हो गई है। जिले में धान, गेहूं, मटर व सरसों की परंपरागत खेती के बाद किसानों का रुख तेजी से गन्ना व पिपरमिंट की तरफ भी हुआ। हालांकि गन्ने व पिपरमिंट की खेती में इतनी ज्यादा समस्या जुड़ी हुई है कि तमाम किसानों ने उससे तौबा करना ही उचित समझा। ऐसे में पिछले कुछ वर्षों से जिले में फूलों की खेती का दायरा तेजी से बढ़ रहा है। आलापुर तहसील क्षेत्र के हिसामुद्दीन पिपरा में रहते हैं हरीलाल यादव। वे फूलों की खेती लगभग एक दशक से कर रहे हैं। ढाई से तीन बीघा क्षेत्रफल में वे फूलों की खेती करते हैं। बताया कि इसमें गेंदा, गुलाब व ग्लेडियोलस मुख्य रूप से शामिल है। गेंदे वाली फसल के बाद वे खेत में धान की फसल भी ले लेते हैं, लेकिन गुलाब व ग्लेडियोलस के साथ ऐसा नहीं है। वर्षभर में दो बार अक्तूबर व फरवरी में गेंदे की कटिंग की जाती है, जिससे उत्पादन बढ़ सके। बताया कि एक बीघे में गेंदे की फसल लगाने पर वर्षभर में 80 हजार से एक लाख रुपये तक की बचत हो जाती है। इस पर 20 से 30 हजार रुपये की ही लागत आती है। गुलाब की खेती से भी वे वर्ष में 30 से 40 हजार रुपये बचा लेते हैं।
बकौल हरीलाल सबसे ज्यादा फायदा ग्लेडियोलस की खेती में है। बताया कि एक बीघा खेत में लगभग 60 हजार पौधे लगाए जाते हैं। इसकी बिक्री तीन से पांच रुपये में होती है। ऐसे में दो से ढाई लाख रुपये तक एक बीघे की फसल में बचाया जा सकता है। कहा कि शादी विवाह के दौर में तो ग्लेडियोलस की कुछ खपत स्थानीय मार्केट में हो जाती है, वरना इस फूल की बिक्री के लिए उन्हें वाराणसी भेजना होता है। अकबरपुर तहसील क्षेत्र के कसेरुआ के दानबहादुर वर्मा ने बताया कि वे मुख्यत: गेंदे की खेती करते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि इस फूल को गाय, बकरी या भैंस के अलावा नीलगाय भी क्षति नहीं पहुंचाते। कहा कि वे साज सजावट का भी काम करते हैं, ऐसे में गेंदे के साथ थोड़ी बहुत गुलाब की खेती कर वे अपने व्यवसाय को लगातार मजबूत बना रहे हैं।
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