कैसा व्यवहार-चलन हो गया, संस्कारों का कितना पतन...

AmbedkarNagar Updated Mon, 05 Nov 2012 12:00 PM IST
अंबेडकरनगर। अकबरपुर नगर के बीएन इंटर कॉलेज में लगे पांच दिवसीय पुस्तक मेले का रविवार को समारोहपूर्वक समापन हुआ। अंतिम दिन कवि सम्मेलन व विचार गोष्ठी के अलावा अन्य आयोजन किए गए। अपनी मनपसंद पुस्तक खरीदने को अंतिम दिन भी पुस्तक प्रेमियों का हुजूम मेले में उमड़ पड़ा।
मैटी हेल्थ केयर एंड सोशल वेलफेयर इंस्टीट्यूट के तत्वावधान में पांच दिवसीय मेले का शुभारंभ विगत बुधवार को किया गया था। मेले में विभिन्न प्रकाशनों की पुस्तकों के स्टाल लगाए गए। प्रतियोगी परीक्षाओं से संबंधित पुस्तकों के अलावा धार्मिक पुस्तकों के स्टाल भी लगाए गए। पहले दिन से ही पुस्तक प्रेमियों का रेला मेला परिसर में पहुंचने लगा। लोगों ने अपनी मनपसंद पुस्तकों की जमकर खरीददारी की। इस दौरान गोष्ठियों सहित विविध कार्यक्रमों का आयोजन कर लोगों को जिंदगी में पुस्तक के महत्व के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई। गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे टीएन डिग्री कॉलेज के प्राचार्य डॉ. रमेशचंद्र पाठक ने कहा कि ज्ञान से बड़ी पूंजी कोई नहीं है। जितना भी ज्ञान अर्जित किया जाए, वह कम ही होता है। ज्ञान हासिल करने का सबसे बड़ा माध्यम पुस्तक है। इसलिए हमें चाहिए कि विविध प्रकार की पुस्तकों का अध्ययन करें। उन्होंने मेला आयोजकों की सराहना करते हुए कहा कि इस प्रकार के मेले का आयोजन समय-समय पर करते रहना चाहिए। मुख्य अतिथि खंड शिक्षा अधिकारी कटेहरी सुरेश कुमार ने कहा कि पुस्तक मेले से लोगों को वे पुस्तकें भी सस्ती दर पर मिल जाती हैं, जिनकी तलाश में उन्हें दरदर भटकना पड़ता है। विशिष्ट अतिथि डॉ. नंदलाल व शीतला सिंह ने पुस्तकों की सफलता में योगदान पर विस्तार से प्रकाश डाला। संस्था अध्यक्ष अरविंद कुमार ने कहा कि जिस प्रकार से मेले में बड़ी संख्या में युवाओं ने भाग लिया है, उसे देखते हुए इस बात का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है कि पुस्तक के प्रति उनका प्रेम बढ़ा है।
पुस्तक मेले के अंतिम दिन कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। कवि सम्मेलन की अध्यक्षता कर रहे कोमल शास्त्री ने कहा ‘देश को नरेश नहीं, सूर्यवीर चाहिए, नौकरों की चाह नहीं कर्मवीर चाहिए’। कवयित्री निरुपमा श्रीवास्तवा ने अपनी ओजस्वी वाणी में ‘न तो मस्जिद न ही शिवाला चाहिए, न कोई सम्मान न अमृत का प्याला चाहिए।
देश का अब अंग कोई भंग न हो, बस इसलिए हरहाथ में राणा का भाला चाहिए।’ सुनाकर कर लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इंसानी फितरत से क्षुब्ध कवि अकेला ने अपनी पीड़ा इन पंक्तियों ‘कैसा व्यवहार कैसा चलन हो गया, संस्कारों का कितना पतन हो गया। अपना हित न किसी का भला चाहते, इतना दूषित मानव का मन हो गया।’ के जरिये व्यक्त की। इनके अलावा अमरनाथ स्वामी व रामचंद्र द्विवेदी समेत कई अन्य स्थानीय व बाहरी कवियों ने अपनी-अपनी रचनाएं प्रस्तुत कीं। संयोजक तारकेश्वर मिश्र जिज्ञासु ने सभी सहयोगियों का आभार जताया।

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