अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है अकबरपुर का गांधी आश्रम

AmbedkarNagar Updated Tue, 02 Oct 2012 12:00 PM IST
अंबेडकरनगर। खादी के साथ क्रूर मजाक देखना हो, तो गांधी आश्रम अकबरपुर आइए। इसे विडंबना ही कहेंगे कि जब खादी को लेकर युवाओं तक में लगाव तेजी से बढ़ा है, तब गांधी आश्रम में खादी वस्त्रों का उत्पादन लगातार घट रहा है। केंद्र व प्रदेश सरकारों द्वारा लगभग तीन करोड़ रुपये दबाकर बैठ जाने का नतीजा यह है कि यह गांधी आश्रम अपने अस्तित्व के संकट से जूझने को विवश है। लाखों रुपये की कीमती मशीनें जंक खा रही है, तो वहीं साबुन विभाग पूरी तरह बंद हो चुका है। मशीनों से रंगाई व छपाई का कार्य भी ठप है। कर्मचारियों के भुगतान को लाले पड़े हुए हैं।
अकबरपुर नगर स्थित गांधी आश्रम की गिनती कभी प्रदेश के चुनिंदा आश्रमों में होती थी। यहां पर तैयार होने वाला सामान फैजाबाद, लखनऊ, इलाहाबाद, प्रतापगढ़, जौनपुर व बनारस आदि जिलों की 250 शाखाओं पर भेजा जाता रहा है। यह बात अलग है कि उपेक्षा के चलते बीते पांच वर्षों में ही लगभग 50 से अधिक शाखाओं पर ताला लटक चुका है। बताते चलें कि इस आश्रम की स्थापना वर्ष 1920 में महज 700 रुपये की लागत से हुई थी। प्रसिद्ध गांधीवादी जेपी कृपलानी ने इसकी स्थापना कराई थी। शुरुआती दौर के बाद से ही गांधी आश्रम ने प्रगति का जो रास्ता तय किया, वह उसे आदर्श श्रेणी तक ले गया। हालांकि अब यही गांधी आश्रम वक्त के थपेड़ों से पूरी तरह बेजार हो गया है। खादी कर्मियों के मुताबिक इसमें केंद्र व प्रदेश सरकारों की नकारात्मक भूमिका सबसे अहम कारण है। असल में गांधी आश्रम का उत्तर प्रदेश सरकार पर 2 करोड़ 63 लाख 18 हजार रुपये बकाया है। यह वह रकम है, जो गांधी जयंती व अन्य मौकों पर सरकार द्वारा घोषित होने वाली छूट के चलते मिलती है। केंद्र सरकार पर भी विपणन विकास सहायता के रूप में 31 लाख 70 हजार रुपये बकाया है। 6 वर्ष से अधिक का समय बीत गया, लेकिन भुगतान नहीं हो पा रहा है। इससे पूर्व भी बकाए को लेकर गांधी आश्रम को लंबी माथापच्ची करनी पड़ी थी।
सरकारों के इन रवैये व उपेक्षा के चलते ही जिस गांधी आश्रम में लगभग 10 वर्ष पूर्व 1200 वर्कर काम करते थे। आज वहां यह संख्या घटकर लगभग 300 रह गई है।
लाखों रुपये के उपकरण यहां अब निष्प्रयोज्य हो गए हैं। इसमें कपड़ा सुखाने के लिए लगाई गई मशीन, बड़ा वायलर व मिट्टी के तेल का टैंकर आदि मुख्य रूप से शामिल हैं। छपाई के कार्य में जहां पहले 50 से 60 कर्मचारी जुटे नजर आते थे, वहीं अब यह संख्या 6-7 पर सिमट गई है। वस्त्र का उत्पादन भी तेजी से गिरा है। करोड़ों रुपये का टर्न ओवर करने वाला गांधी आश्रम लगातार गिरते उत्पादन के चलते लाखों के टर्न ओवर तक आ गया है। संसाधनों के संकट का ही नतीजा है कि गांधी आश्रम का एक प्रमुख अनुभाग था साबुन विभाग। यहां बनने वाले साबुन की खूब मांग थी, लेकिन मांग होने के बावजूद अब यहां साबुन नहीं बनता। बस नाम के लिए ही गांधी आश्रम चल रहा है। उस पर भी बचे हुए कर्मचारियों का दर्द यह कि समय पर उनके वेतन का भुगतान तक नहीं हो पाता। धरना, प्रदर्शन व अनशन का सहारा लेने को विवश कर्मचारियों को उस संस्था के विरुद्ध ही खड़ा होना पड़ता है, जो शांति व संयम का प्रेरणा देती रही है।

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