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लाखों का बजट पर बदहाली से जूझ रहीं छात्राएं

AmbedkarNagar

Updated Fri, 28 Sep 2012 12:00 PM IST
अंबेडकरनगर। जिले के राजकीय कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों की दशा अत्यंत खस्ताहाल है। छात्राओं की सुविधा के लिए भले ही लाखों रुपये का बजट आता है, लेकि न इसके पूर्ण लाभ से छात्राएं वंचित हैं। न तो भोजन में आमतौर पर मानक का ध्यान रखा जाता है, और न ही बेहतर पेयजल प्रबंध की व्यवस्था है। अव्यवस्था का आलम यह कि जिस फील्ड में छात्राओं को खेलने कूदने की सुविधा मिलनी चाहिए, वहां पर बड़ी-बड़ी जंगली घास नजर आती है। कहीं पर खुले में भोजन बन रहा है, तो कहीं पर गंदगी के बीच ही छात्राओं को अपना दिन गुजारने को विवश होना पड़ रहा है। सभी आवासीय विद्यालयों में अभी तक चहारदीवारी की सुविधा नहीं हो पायी है। चिकित्सकीय सुविधा के लिए हालांकि ऑन कॉल चिकित्सक का प्रबंध होता है, लेकिन यह सिर्फ कागजों तक सीमित है।
कमजोर वर्ग की बालिकाओं को आवासीय शिक्षा प्रदान करने के लिए जिले में 8 कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों की स्थापना की गयी। यहां छात्राओं के हितों को लेकर अधिकारियों की मनमानी साफ नजर आती है। लगभग सभी आवासीय विद्यालय अभी तक सभी सुविधा से परिपूर्ण नहीं किये जा सके हैं। ‘अमर उजाला टीम’ ने गुरुवार को बेवाना स्थित कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय का जायजा लिया। मुख्य गेट से परिसर में प्रवेश करने पर चारों तरफ जंगली घासफूस का साम्राज्य दिखा। यह फील्ड छात्राओं के खेलने में प्रयुक्त होनी चाहिए, लेकिन यहां जंगली घासों के चलते वे सिर्फ कमरों में ही कैद होकर रह गयीं हैं। यहां कुल 99 छात्राएं पंजीकृत हैं। अव्यवस्था का आलम यह कि छात्राओं के लिए भोजन बाहर खुले में बनता है। चूल्हे के ऊपर एक पन्नी टांग दी गयी है। कई बार चूल्हे तक कुकुर व अन्य जानवर भी पहुंच जाते हैं। इसके बावजूद यहां खाना खुले में बनता है। विद्यालय कक्ष के शीशे टूटे हुए मिले। विद्यालय वार्डेन न तो स्वयं मिलीं और न ही छात्राओं से मुलाकात करायी, लेकिन कमरों में जाने पर साफ दिखा कि वहां गंदगी का माहौल है। जिन कमरों में छात्राओं को सोना होता है, वहां पर कटी हुई सब्जियां, गंदे बोरे तथा कई अन्य सामान रखे हुए थे। जहांगीरगंज विकास खंड का विद्यालय जूनियर हाईस्कूल देवरिया बुजुर्ग के भवन में जैसे-तैसे चल रहा है। यहां पर चहारदीवारी नहीं है। यही हाल तिवारीपुर स्थित विद्यालय का भी है। जलालपुर तहसील क्षेत्र के रतना स्थित विद्यालय में तो सभी छात्राएं लगातार निवास ही नहीं करतीं। अव्यवस्थाओं के चलते वे प्राय: घर चली जाती हैं। सम्मनपुर थाना क्षेत्र के बड़ेपुर में चल रहा कस्तूरबा गांधी विद्यालय भी उपेक्षा की मार सह रहा है। अधिकांश विद्यालयों में निर्धारित मीनू के अनुरूप भोजन मिल पाना सबसे बड़ी चुनौती है। इसका एक कारण यह भी है कि इन विद्यालयों को राशन ही कम मात्रा में उपलब्ध कराया जाता है। हालांकि रिकार्ड में सब कुछ चाक चौबंद रहता है। छात्राओं के स्वास्थ्य को बेहतर रखने के लिए ऑन कॉल चिकित्सक भी संबद्ध होते हैं। नियमानुसार समय-समय पर छात्राओं की जांच चिकित्सक से करायी जानी चाहिए, लेकिन शायद ही किसी विद्यालय में ऐसा होता हो।
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