मरीजों के लिए नहीं खुला 200 शय्या का भवन

AmbedkarNagar Updated Fri, 31 Aug 2012 12:00 PM IST
अंबेडकरनगर। स्वास्थ्य मंत्री के गृह जनपद में ही जिला चिकित्सालय अव्यवस्थाओं के घेरे में है। यहां मरीजों को सुचारु सुविधा उपलब्ध कराने के लिए न तो चिकित्सालय प्रशासन गंभीर है और न ही जनप्रतिनिधि। 45 लाख रुपये की लागत से बने टीबी सेंटर और 50 लाख की लागत से बने ब्लड बैंक का अभी तक मरीजों को लाभ नहीं मिल सका है। वहीं चिकित्सालय का विस्तारीकरण कर 300 शय्या का तो कर दिया गया, लेकिन अभी तक 200 शय्या का नया भवन मरीजों के लिए नहीं खोला जा सका है। सिर्फ इतना ही नहीं वार्डों में बेड तक ऑक्सीजन पहुंचाने के लिए पाइप लाइन तो लगा दी गई, लेकिन इन पाइपों में ऑक्सीजन का प्रवाह होना बाकी है। गंदगी से लेकर चिकित्सकों व कर्मचारियों की मनमानी आदि समस्याओं से भी जूझने को मरीज और तीमारदार मजबूर हैं।
जिला चिकित्सालय में स्वास्थ्य सेवा पटरी पर नहीं आ पा रही है। खास बात यह है कि इसी जिले में स्वास्थ्य विभाग के कैबिनेट व राज्यमंत्री दोनों हैं। दोनों मंत्रियों द्वारा मरीजों को सुचारु स्वास्थ्य सुविधा दिए जाने के बढ़ चढ़कर दावे आए दिन किए जाते हैं, लेकिन यह दावे जमीनी हकीकत पर नजर नहीं आते। इसी का नतीजा है कि जिला चिकित्सालय में ही मरीजों को विभिन्न समस्याओं से दो चार होना पड़ रहा है। उन्हें कभी बाहर से दवा लेने के लिए मजबूर होना पड़ता है, तो कभी ऑपरेशन के लिए खुद जनरेटर लेकर आना पड़ता है। स्ट्रेचर के अभाव में तीमारदारों को स्वयं ही अपने मरीजों को एक वार्ड से दूसरे वार्ड में ले जाना पड़ता है। सिर्फ इतना ही नहीं ड्यूटी के बाद भी चिकित्सक या तो समय से चिकित्सालय ही नहीं पहुंचते और यदि पहुंचते भी हैं, तो कुछ देर तक बैठकर उठकर चला जाना उनकी आदत सी बन गई है।
चिकित्सालय की उपेक्षा का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि लगभग 45 लाख रुपये की लागत से टीबी सेंटर को बने लगभग तीन वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन इसका लाभ मरीजों को अभी तक नही मिल सका है। 15 जनवरी 2011 को तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने अपने जन्मदिन पर जिला चिकित्सालय का विस्तारण कर 100 शय्या से बढ़ाकर 300 शय्या का कर दिया था। अभी तक 100 शय्या वाले चिकित्सालय में ही पूरा स्टाफ नहीं हो सका है, तो शेष 200 शय्या वाले भवन का क्या हाल होगा, इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। इसी प्रकार लगभग 50 लाख रुपये की लागत से बना ब्लड बैंक भी खुलने की बाट जोह रहा है। चिकित्सालय परिसर से लेकर वार्ड के अंदर तक फैली रहने वाली गंदगी की तरफ प्रशासन का ध्यान नहीं है। चिकित्सालय में पांच जनरेटर होने के बाद भी मरीजों व उनके तीमारदार अंधेरे में रहते है। मरीजों के साथ आए तीमारदारों के लिए लाखों की लागत से रैन बसेरे का निर्माण तो चिकित्सालय परिसर में कराया गया है, लेकिन उसका प्रयोग चिकित्सक व कर्मचारी अपने वाहन खड़े करने में करते हैं। चिकित्सालय परिसर में साइकिल स्टैंड तो है, लेकिन वहां झाड़ झंखाड़ का बसेरा है। और तो और चिकित्सालय परिसर में पार्क भी उपेक्षा का शिकार होकर रह गया है। यहां बड़ी बड़ी जंगली घासें उग आई हैं।

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