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डॉ. जेतली ने लिखी थी समाजसेवा की नई इबारत

AmbedkarNagar Updated Mon, 13 Aug 2012 12:00 PM IST
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अंबेडकरनगर। चिकित्सकों को धरती का भगवान यूं ही नहीं कहा गया। प्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी डॉ. गणेशकृष्ण जेतली ने इसे साकार भी कर दिखाया था। समाजसेवा की एक नई इबारत लिखने वाले डॉ. जेतली ने न सिर्फ अछूतों की सेवा से मना करने पर एक प्रसिद्ध चिकित्सालय की नौकरी से त्यागपत्र दे दिया, वरन आजादी के आंदोलन में कूद पड़े। लगभग दस वर्ष तक विभिन्न जेलों में सजा काटने वाले डॉ. जेतली आजादी के बाद अकबरपुर के पहले विधायक बने।
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मूलत: कश्मीर के रहने वाले डॉ. गणेशकृष्ण जेतली ने अकबरपुर की धरती को गौरवान्वित करने का कार्य किया। वे आजादी के संघर्ष के दौरान ही अपने परिजनों के साथ यहां आ बसे थे। एमबीबीएस परीक्षा उत्तीर्ण की और वे बनारस के प्रसिद्ध काशी मारवाड़ी अस्पताल में नौकरी पाने में सफल रहे। अस्पताल प्रशासन द्वारा वर्ष 1931 में चिकित्सालय के अंदर अछूतों के इलाज पर रोक लगाए जाने के विरोध स्वरूप उन्होंने नौकरी से त्यागपत्र दे दिया। नौकरी छोड़ने के बाद वे आजादी के आंदोलन में कूद पड़े। 1934 में बिहार में आए विनाशकारी भूकंप में वे डॉ. राजेंद्र प्रसाद के नेतृत्व में बनी चिकित्सीय टीम में शामिल हुए और भूकंप पीड़ितों की अथक सेवा की। आंदोलन में कूदने से उनके परिवार के सामने आर्थिक संकट जरूर आया, लेकिन न सिर्फ वे परिवार का मनोबल राष्ट्र भक्ति की बातों से बढ़ाते रहे, वरन उनकी पत्नी डॉ. सुमित्रा जेतली भी उनके प्रत्येक निर्णय में कदम दर कदम खड़ी नजर आईं। राजस्थान के देवली नजरबंद कैंप से डॉ. जेतली व उनकी पत्नी के बीच हुए कई पत्राचार ऐसे सार्वजनिक हुए हैं, जो आज भी लोगों को प्रेरणा देते नजर आते हैं। आजादी के आंदोलन में डॉ. जेतली फैजाबाद, सुल्तानपुर, आगरा व बनारस की जेलों में भी बंद हुए। कुल 10 वर्ष उन्हें जेल की सजा काटनी पड़ी। उनके पुत्र पूर्व विधायक प्रियदर्शी जेतली बताते हैं कि वर्ष 1938 में अयोध्या में हुए राजनैतिक सम्मेलन में उन्होंने अकबरपुर से एक लाख किसानों के पद मार्च का नेतृत्व किया था। ऐसा इसलिए क्योंकि उन्होंने सेवा को ही सदैव अपना धर्म माना था। डॉ. जेतली को आजादी के बाद वर्ष 1948 में हुए चुनाव के दौरान अकबरपुर का पहला विधायक चुनने का मौका मिला। विधायक रहते हुए ही 14 अगस्त 1950 को उन्होंने अपने जीवन की अंतिम सांस ली।

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