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गंगा के मूल स्वरूप को छेड़ा तो बिगड़ जाएंगे हालात

अमर उजाला ब्यूरो, प्रयागराज Updated Sun, 09 Dec 2018 01:39 AM IST
गंगा
गंगा - फोटो : file photo
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कुंभ के लिए गंगा की धाराओं को एक करने की कवायद इस राष्ट्रीय नदी की सेहत पर भारी पड़ सकती है। पर्यावरणविदों और वैज्ञानिकों को डर है कि यदि गंगा के मूल स्वरूप से छेड़छाड़ की गई को हालात बिगड़ सकते हैं। जैव पारिस्थितिकी के साथ ही जल की गुणवत्ता और उपलब्धता दोनों प्रभावित होगी। इसका सीधा असर पर्यावरण के साथ उन लाखों श्रद्धालुओं पर भी पड़ेगा जो सिर्फ गंगा के लिए यहां एक माह का कल्पवास करते हैं।
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मेला प्रशासन ने फाफामऊ से लेकर संगम के बीच बहने वाली गंगा की तीन धाराओं को ड्रेजिंग मशीन की मदद से एक में मिला दिया है। इससे मेले के लिए अतिरिक्त भूमि तो मिल जाएगी, मगर गंगा के नैसर्गिक प्रवाह को रोकने के अपने दुष्परिणाम होंगे। हाईकोर्ट में गंगा प्रदूषण याचिका के न्यायमित्र अरुण कुमार गुप्ता कहते हैं कि मेला प्रशासन ने बिना किसी विशेषज्ञ की राय लिए धाराओं को एक करना शुरू कर दिया है। अरुण गुप्ता ने हाईकोर्ट में अर्जी दाखिल कर इस मुद्दे पर सुनवाई करने का कोर्ट से अनुरोध किया है। अर्जी में कहा गया है कि मेले में आने वाले और कल्पवास करने वाले श्रद्धालुओं का मुख्य आधार गंगाजल ही है। श्रद्धालु धार्मिक कार्यों से लेकर खाना बनाने, पीने और गंगाजल को साथ ले जाने में इसका इस्तेमाल करते हैं, ऐसे में गुणवत्ता युक्त जल मिलना आवश्यक है।

न्यायमित्र को गंगा पर शोध करने वाले दो विशेषज्ञों ने ई-मेल भेज कर गंगा के नैसर्गिक प्रवाह में छेड़छाड़ करने के खतरे से आगाह किया है। न्यायमित्र ने कोर्ट में दी अर्जी में इन विशेषज्ञों की राय भी शामिल की है। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और मदन मोहन मालवीय इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के निदेशक प्रो. यूके चौधरी और मोतीलाल नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर एचके पांडेय ने गंगा के नैसर्गिक प्रवाह को रोकने के प्रति आगाह किया है।

विशेषज्ञों की राय है कि गंगा की धाराएं उसके नीचे के तापमान को नियंत्रित करती हैं। इससे पीएच वैल्यू और बॉयो ऑक्सीजन डिमांड तथा डीओ संतुलित रहता है। गंगा में रहने वाले तमाम जीव जंतु मछलियां, कछुए, मेढक और शैवाल आदि इन धाराओं के नीचे प्रजनन करते हैं। उनके अंडे आदि इनके नीचे संरक्षित होते हैं। जैव पारिस्थितिकी से जल का स्तर बना रहता है। दूसरा बड़ा नुकसान यह होगा कि गंगा की धाराओं को समाप्त कर देने से उसका क्षेत्रफल कम हो जाएगा। गंगाजल की निर्मलता के लिए उसमें अधिक पानी छोड़ना जरूरी है और अधिक पानी छोड़ने पर नदी के क्षेत्रफल में स्वाभाविक रूप से विस्तार होगा, जिससे मेला क्षेत्र में बाढ़ की स्थिति आ जाएगी। यदि पानी नहीं छोड़ा गया तो श्रद्धालुओं को शुद्ध की जगह प्रदूषित पानी मिलेगा। अरुण गुप्ता बताते हैं कि गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करने के लिए जारी अधिसूचना में यह स्पष्ट प्रावधान है कि गंगा के मूल स्वरूप से कोई छेड़छाड़ नहीं की जाएगी। ऐसा करना गैरकानूनी है।

गंगा की निर्मलता और अविरलता को बनाए रखने के लिए राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने भी हस्तक्षेप किया है। प्रयागराज आगमन के दौरान राष्ट्रपति ने न्यायमित्र अरुण गुप्ता से मुलाकात कर गंगा पर विस्तृत चर्चा की थी। इसके बाद राष्ट्रपति को एक शिकायती पत्र भी भेजा गया था। इस पत्र पर राष्ट्रपति कार्यालय ने संज्ञान लेते हुए मुख्यमंत्री कार्यालय को संदर्भित किया तथा गंगा की अविरलता और निर्मलता बनाए रखने के लिए हाईकोर्ट के निर्देशों का पालन करने का आग्रह किया है। मुख्यमंत्री कार्यालय ने जुलाई में भेजे गए इस पत्र को पांच दिसंबर को सिंचाई विभाग को इस निर्देश के साथ भेजा है कि हाईकोर्ट के आदेशों के अनुसार गंगा में पर्याप्त मात्रा में जल की उपलब्धता बनाने की दिशा मेें कदम उठाए जाएं। हालांकि, हाईकोर्ट का आदेश हर माघ मेले और कुंभ मेले के लिए है कि प्रमुख स्नानपर्वों पर गंगा में पर्याप्त मात्रा में जल उपलब्ध कराया जाए।

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