कुंभ मेले पर छायी घोटालों की काली छाया

इलाहाबाद/ब्यूरो Updated Fri, 19 Oct 2012 12:36 PM IST
grim specter of scams on kumbh mela
कुंभ मेले की वेबसाइट मेला प्रशासन के गले की हड्डी बन गई है। मेला प्रशासन वेबसाइट पर वो तमाम जानकारियां अपलोड करने से कतरा रहा है, जिनके कारण पूर्व में विवाद होते रहे हैं। तीन माह पहले तक मेला प्रशासन कुंभ से जुड़े कार्यों में पारदर्शिता लाने का दावा कर रहा था लेकिन अब उन्हीं कार्यों से जुड़ी जानकारियां गोपनीय रखे जाने का प्रयास हो रहा है। मेला प्रशासन की तरफ से कुंभ के लिए तैयार की जा रही वेबसाइट महज दिखावे तक सीमित रह गई है। अगर सुधार नहीं हुआ तो पर्यटकों और श्रद्धालुओं को इस वेबसाइट से कोई लाभ नहीं मिलेगा और मेला प्रशासन के दावे की भी हवा निकल जाएगी।

मेला कार्यालय के सूत्रों के अनुसार कुंभ से जुड़ी जो भी सूचनाएं हैं, वे कलेक्ट्रेट परिसर स्थित एनआईसी कार्यालय के माध्यम से ऑनलाइन अपलोड की जा रही हैं। एनआईसी दफ्तर को सिर्फ वही सूचनाएं मुहैया कराई जा रही हैं, जिनसे कुंभ में आने वाली संस्थाओं, श्रद्धालुओं और पर्यटकों को खास फायदा नहीं मिलने वाला। अफसरों ने दावा किया था कि कुंभ से जुड़ी एक-एक जानकारी ऑनलाइन की जाएगी लेकिन जब सूचनाएं अपलोड कराने का वक्त आया तो फाइलें गुम हो गईं या आधी-अधूरी पड़ी हैं।

सुविधाओं के बदले वसूली की आशंका
योजना थी कि कुंभ की वेबसाइट पर संस्थाओं के नाम अपलोड कर दिए जाएंगे। साथ ही यह जानकारी भी अपलोड की जाएगी कि किस संस्था को कितनी सुविधा मिली। तय हुआ था कि पिछले कुंभ एवं अर्धकुंभ में जो संस्थाएं आईं, उन्हें इस बार के कुंभ में वही सुविधाएं दी जाएं, जो पूर्व में उन्हें आवंटित की गई थीं। यह भी योजना थी कि हर संस्था की अपनी आईडी होगी, जिसके जरिए वेबसाइट पर डाली गई संस्था से संबंधित सभी सूचनाओं का प्रिंट भी निकाला जा सकेगा।

इस बाबत जब सभी सूचनाएं वेबसाइट पर अपलोड किए जाने का वक्त आया तो एनआईसी को फाइलें ही मुहैया नहीं कराई गईं। सूत्रों ने बताया कि अगर सुविधाओं से संबंधित सभी सूचनाएं ऑनलाइन कर दी गईं तो संस्थाएं मेला प्रशासन के दफ्तर आने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। ऐसे में उन लोगों की दुकानें बंद हो जाएंगी जो पिछले कई मेलों में इसी की आड़ में संस्थाओं से अच्छी-खासी वसूली कर रहे थे।

सीमा में हेरफेर से लाखों का ‘खेल’
कुंभ हो या अर्धकुंभ, पिछले तमाम आयोजनों का रिकॉर्ड देखा जाए तो एक शिकायत जरूर मिल जाएगी। संस्थाएं नापजोख को लेकर हमेशा से सवाल उठाती रही हैं। अक्सर यह आरोप लगते रहे हैं कि उन्हें जितनी जमीन आवंटित की गई, नापजोख के दौरान उसमें से थोड़ी-बहुत कटौती कर ली गई और काटा गया हिस्सा दूसरे को दे दिया गया। अगर संस्थाओं से जुड़ी सभी सूचनाएं वेबसाइट पर अपलोड कर दी जाएंगी तो संस्थाओं को किस सेक्टर में कितनी जमीन आवंटित की गई और उसकी सीमा कितनी है, इस बाबत सभी जानकारियां ऑनलाइन हो जाएंगी और संस्थाएं सीधे मेला क्षेत्र में आकर बस जाएंगी। लेकिन इस व्यवस्था से उन लोगों को नुकसान होगा जो नापजोख की आड़ में लाखों रुपए के हेरफेर की ताक में थे, सो कोशिश की जा रही है कि सूचनाएं ऑनलाइन न हो पाएं। हालांकि इसके लिए अलग सॉफ्टवेयर भी बनाया गया है।

अब तक गठित नहीं हुई मेला सलाहकार समिति
मेले में जमीन आवंटन का मामला हो या सुविधा आवंटन का, इनके बारे में कुछ भी तय होने से पहले मेला सलाहकार समिति की बैठक में चर्चा की जाती है लेकिन इस बार अब तक समिति का गठन भी नहीं किया गया। समिति में नाविकों, तीर्थ-पुरोहितों को भी शामिल किया जाता है। अफसर अब समिति से सलाह लिए बगैर अपने हिसाब से फैसले कर रहे हैं।

‘वेबसाइट पर सूचनाओं को अपलोड करने का मसला हो या मेला सलाहकार समिति के गठन का, इस बारे में पूरी छानबीन कराई जाएगी। मेले की व्यवस्था को पूरी तरह से पारदर्शी रखा जाएगा। कोशिश यही की जा रही है कि श्रद्धालुओं, पर्यटकों या संस्थाओं को किसी तरह की असुविधा न हो।’
- देवेश चतुर्वेदी, कमिश्नर

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