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प्रत्यावेदन के निस्तारण में सुविधा नहीं देख सकती सरकार

अमर उजाला, इलाहाबाद Updated Tue, 06 Jun 2017 02:23 AM IST
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सरकार अपनी अभिरक्षा में निरुद्ध बंदी का प्रत्यावेदन अपनी सहूलियत और इच्छा से निस्तारित नहीं कर सकती है। ऐसा करना बंदी के मौलिक अधिकार का हनन है। यदि प्रत्यावेदन की निस्तारण मेें अकारण विलंब होता है तो बंदी का प्रत्यावेदन देना अर्थहीन हो जाएगा। हाईकोर्ट ने गोवंशीय पशु काटने के आरोप में निरुद्ध किए गए अलीगढ़ के कदीर के प्रत्यावेदन का निस्तारण करने में केंद्र सरकार की हीलाहवाली को देखते हुए उसे तत्काल अभिरक्षा से मुक्त करने का आदेश दिया है।
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कदीर ने हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल की थी। कहा गया कि उसे आठ जून 2016 को पुलिस ने गोवंशीय पशु काटने के आरोप में गिरफ्तार किया था। 29 जून 2016 को यूपी एडवाइजरी बोर्ड लखनऊ द्वारा सत्यापित निरुद्धि आदेश दिया गया। इसमें निरुद्धि के कारणों का हवाला दिया गया था। इसके बाद डीएम की संस्तुति पर पहले नौ माह और फिर तीन माह के लिए और निरुद्धि बढ़ा दी गई। इस आदेश के खिलाफ उसने राज्य और केंद्र सरकार को कई प्रत्यावेदन भेजे, मगर उनका निस्तारण नहीं किया गया।


जस्टिस बीके नारायण और जस्टिस अरविंद कुमार मिश्र की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए पाया कि कदीर का प्रत्यावेदन राज्य सरकार ने सुनवाई के बाद निरस्त कर दिया, मगर केंद्र ने इसका निस्तारण नहीं किया है। कोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार याची का प्रत्यावेदन सलाहकार परिषद के पास भेज सकती थी और यदि परिषद इसे रद्द भी कर देता तब भी सरकार के पास बंदी को रिहा करने का अधिकार था, मगर प्रत्यावेदन निस्तारित न करना बंदी के मौलिक अधिकार का हनन है। कोर्ट ने कदीर की निरुद्धि संबंधी सभी आदेश रद्द करते हुए उसे रिहा करने का आदेश दिया है।

उल्लेखनीय है कि 8 जून 2016 को थानाध्यक्ष जावा को फोन पर सूचना मिली थी कि अमरौली गांव के नौबत सिंह इंजीनियर के घर पर गोवंशीय पशु काटे जा रहे हैं। घटनास्थल पर पहुंचने पर पाया गया कि वहां जानवर के कटे हुए हिस्से, मांस और खून फैला हुआ था। वहां पांच सौ लोगों की भीड़ इकट्ठा थी जिससे दो समुदाय में तनाव की स्थिति पैदा हो गई थी। थानाध्यक्ष की लिखित रिपोर्ट पर गोवध निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया था।

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