कक्षाओं की जगह ‘सड़क की पढ़ाई’ को मजबूर हुए छात्र

Allahabad Updated Fri, 24 Jan 2014 05:43 AM IST
इलाहाबाद। इलाहाबाद विश्वविद्यालय और संघटक कालेजों के छात्र-छात्राएं कक्षाओं की जगह आंदोलन की पढ़ाई पढ़ने के लिए मजबूर हैं। शिक्षकों की कमी तथा प्रशासनिक अराजकता ने उन्हें सड़क पर उतरने के लिए विवश कर दिया है। इन संस्थानों में पिछले तीन साल से पढ़ाई की स्थिति बदतर है। उल्टे आराजकता हावी है, जिसके निशाने पर शिक्षक भी हैं। विश्वविद्यालय में इस सत्र में तो गिनती की कक्षाएं चलीं। पूरे साल की पढ़ाई कभी छात्र आंदोलनों तो कभी शिक्षकों की सियासत में फंसकर रह गई। मुश्किल यह कि स्थिति में सुधार की भी उम्मीद नहीं है। आलम यह है कि इस सत्र में कोई भी ऐसा दिन नहीं रहा जब विश्वविद्यालय में कोई आंदोलन न हुआ हो। ध्यान देने वाली बात यह है कि विश्वविद्यालय की समस्याओं को लेकर ही नहीं उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग तथा अन्य भर्ती संस्थाओं के खिलाफ आंदोलन के लिए विश्वविद्यालय परिसर केंद्र बना रहा। इस अराजकता की चपेट में आसपास के दुकानदार तथा लोग भी आए।
इस सत्र में पढ़ाई की बात करें तो शुरुआत ही विवाद से हुई। कागज पर सत्र 11 जुलाई से शुरू हो गया लेकिन पूरी प्रवेश प्रक्रिया ही विवादों में रही। इसकी वजह से सितंबर तक तो प्रवेश हुए। इसके बाद कक्षाएं चलने की नौबत आई। अगस्त में निष्कासित छात्रों की बहाली, प्रवेश प्रक्रिया में अनियमितता कई बार विश्वविद्यालय बंद करना पड़ा। विश्वविद्यालय के इतिहास में संभवत: पहली बार हंगामा के कारण कार्यपरिषद की बैठक स्थगित करनी पड़ी। इसके बाद इन मुद्दों के साथ छात्रसंघ चुनाव, पर्याप्त संख्या में क्लास रूम नहीं होने, शोध पाठ्यक्रम में प्रवेश में अनियमितता आदि को लेकर संघर्ष हुआ। चुनाव की तिथि तथा चुनाव अधिकारी की घोषणा को लेकर आंदोलन के दौरान दो दिन तक कुलपति अपने आवास में बंधक बने रहे। अन्य अफसर तो कई बार बंधक बनाए गए। इस दौरान पढ़ाई पूरी तरह से बाधित रही। इसके बाद शीतावकाश हो गया। फिर छात्रसंघ चुनाव के लिए बजट को लेकर आंदोलन तथा उसकी तैयारी के कारण पढ़ाई बाधित हुई। इन सभी के बाद अभी पढ़ाई की उम्मीद बनी थी कि जेके इंस्टीट्यूट के हेड समेत अन्य शिक्षकों पर अराजक तत्वों ने कक्षाओं में घुसकर हमला बोल दिया। इससे नाराज शिक्षक कार्यबहिष्कार पर चले गए। इसकी वजह से 15 दिन पढ़ाई बाधित रही। इसके बाद शीतावकाश हो गया है। खास यह कि श्क्षिकों की इस सियासी लड़ाई का अंत भी सियासी तरीके से ही हुआ। शिक्षकों का पूरा खेमा बंटा नजर आया। शीतावकाश के बाद एक जनवरी को विश्वविद्यालय खुला कि अगले दिन परिसर में जमकर तांडव हुआ। उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के खिलाफ लड़ाई के लिए विश्वविद्यालय परिसर अखाड़ा बना। इसके अगले दिन पुलिस ने कक्षाओं में घुसकर छात्रों को पीटा। इससे बने तनाव को देखते हुए विश्वविद्यालय बंद कर दिया गया। एक सप्ताह बाद भारी फोर्स के दम पर पढ़ाई शुरू की गई लेकिन सेमेस्टर परीक्षाओं के कारण पढ़ाई बाधित रही। अगले महीने से प्रायोगिक परीक्षाएं शुरू हो जाएंगी। 11 मार्च से वार्षिक परीक्षाएं शुरू हो जाएंगी। यही स्थिति कमोवेश संघटक कालेजों में भी रही और वहां भी गिनती की कक्षाएं चलीं।
विश्वविद्यालय में शिक्षकाें के पांच सौ से अधिक पद खाली हैं। इन पदों पर भर्ती के लिए डेढ़ साल से प्रक्रिया शुरू है लेकिन यह भी विश्वविद्यालय की अराजक कार्यसंस्कृति का शिकार हो गई है। जो स्थिति है उसमें अगले सत्र में भी शिक्षक मिलने की उम्मीद नहीं है। कालेजों की स्थिति तो और भी बदतर है। वहां कई विषयों में एक भी शिक्षक नहीं है। इसको लेकर विश्वविद्यालय प्रशासन कितना गंभीर है इसका अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि गेस्ट फैकेल्टी के लिए जनवरी में आवेदन मांगा गया। अभी तक प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है, जबकि इनकी नियुक्ति फरवरी तक के लिए होनी है। कालेजों में तो यह कवायद भी नहीं की गई।

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