सियासत में नौकरियों की उम्मीदें राख

Allahabad Updated Wed, 22 Jan 2014 05:43 AM IST
इलाहाबाबद। सियासी दावपेच में फंसी नौकरियों से नाउम्मीद हो चुके युवा अब आंदोलन के लिए मजबूर हैं। एक दौर में सबसे अधिक आईएएस देने वाले पूरब के ऑक्सफोर्ड में पूरे प्रदेश से लाखों युवा अफसर बनने का सपना लेकर आए हैं लेकिन उनकी पूरी जवानी किसी और लड़ाई में जाया जा रही है। सभी भर्तियां वर्षों से विवादों में फंसी हैं। इसका नतीजा है कि उनकी नाराजगी की आग में पूरा शहर एक साल झुलस रहा है। इस दौरान सैकड़ों लोग घायल हो चुके हैं। आगजनी में लाखों रुपये की सरकारी तथा निजी संपत्तियां स्वाहा हो चुकी हैं। यह आग अब भी सुलग रही है और किसी भी वक्त एक बार फिर विकराल रूप धारण कर सकती है।
लोअर-सबऑर्डिनेट-2008 की भर्ती प्रक्रिया पांच साल में भी पूरी नहीं हो पाई। इसके अलावा पीसीएस-जे, लोअर सबऑर्डिनेट-2013 समेत कई भर्तियां विवादों में फंसी हैं। नियमित भर्ती नहीं होने के कारण लोअर सबऑर्डिनेट की चार साल की भर्तियां लैप्स कर दी गई हैं। विवाद का प्रमुख कारण भी यही है।
0 उच्चतर शिक्षा सेवा चयन आयोग ने पांच साल से कोई भर्ती नहीं की है। अशासकीय डिग्री कालेजों में शिक्षकों की भर्तियों के लिए दो बार आवेदन मांगा जा चुका है। लाखों फार्म ढेर के रूप में पड़े हैं। तीन हजारों से अधिक पदों के लिए अधियाचन भी हो चुका है लेकिन पहले अध्यक्ष का पद खाली रहा तो अब सदस्यों का कोरम ही पूरा नहीं है। इसकी वजह से भर्तियां लंबित हैं।
0 माध्यमिक शिक्षक सेवा चयन बोर्ड की पीजीटी-टीजीटी-2011 की भर्ति प्रक्रिया तीन साल बाद भी लंबित है। इससे पहले हुई भर्तियाें में सफल पांच सौ अधिक अभ्यर्थी नियुक्ति के लिए आंदोलनरत हैं। टीजीटी-पीजीटी के लिए तीन साल बाद 2014 में फिर आवेदन मांगा गया है।
0 परिषदीय विद्यालयों में शिक्षकों के एक लाख से अधिक पदों पर भर्ती के लिए अभ्यर्थियों को दो साल से इंतजार है। अब भी जल्द भर्ती की उम्मीद नहीं दिख रही।
‘2006 में गोरखपुर से यहां आया। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक और परास्नातक किया। पीसीएस-2011 की मुख्य परीक्षा में शामिल हुआ लेकिन इसके अलावा सिर्फ पीसीएस-2012 में ही मौका मिला। अब घर वाले भी पूछने लगे हैं, कब तक रहोगे। दोराहे की स्थिति है।’
अंकित राय, प्रतियोगी, छोटा बघाड़ा
‘भर्ती संस्थाओं पर से भरोसा उठता जा रहा है। एक तो भर्ती नहीं हो रही। दूसरे पारदर्शिता नहीं रह गई। एसएससी में कुछ वर्षों से नियमित भर्ती हो रही है लेकिन उसमें भी नकल माफिया सक्रिय हैं। बहुत ही निराशाजनक स्थिति है।’
पारुल सिंह, इविवि में परास्नातक की छात्रा
‘आयोग की सभी भर्तियां कोर्ट में हैं। आयोग में किसी की बात नहीं सुनी जा रही। कहीं से प्रेरित होकर निर्णय लिए जा रहे हैं। ऐसे में सड़क पर उतरना हमारी मजबूरी है। अभी तक हमारा आंदोलन आयोग के खिलाफ था। अब इसमें टीईटी, उच्चतर शिक्षा सेवा चयन आयोग तथा अन्य भर्तियों के अभ्यर्थी भी शामिल हो रहे हैं। इस अव्यवस्था के खिलाफ हम चुप नहीं बैठेंगे।’
अशोक मिश्रा, भ्रष्टाचार मुक्ति मोर्चा
‘आंदोलन के लिए व्यवस्था जिम्मेदार है। आयोग की विश्वसनीयता खत्म हो गई है। वहां सही काम होगा तब भी लोगों को लगेगा सब कुछ गलत हो रहा है। विश्वविद्यालय में भी पढ़ाई नहीं हो रही। लड़के खाली हैं। कक्षाएं चलती हैं तो उसमें कुछ नहीं होता। इस स्थिति में लड़कों को दोष नहीं दिया जा सकता। राजनीति और सरकार ने भर्ती संस्थाओं को खत्म कर दिया है।’
प्रोफेसर एमपी दुबे, सीनियर प्रोफेसर, इविवि
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‘भर्तियों की प्रक्रिया त्वरित नहीं होने के कारण सवाल उठना स्वभाविक है। इस स्थिति में इन भर्तियों से प्रभावित युवाओं की नाराजगी स्वाभाविक है। लड़कों को दोष देना उचित नहीं है। समयबद्ध और पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया से यह आंदोलन स्वत: खत्म हो जाएगा।’
प्रोफेसर पीके घोष, शिक्षक, इविवि

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