बढ़ रहे बहुसंख्यकवाद पर जरूरी है लगाम

Allahabad Updated Sun, 24 Nov 2013 05:40 AM IST
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इलाहाबाद। अनेक संगठनों की साझा पहल ‘इंसाफ सबके लिए’ के राष्ट्रीय अभियान के तहत देश भर से जुटे प्रगतिशील चिंतकों ने दो टूक कहा कि देश में बढ़ रहे बहुसंख्यकवाद पर लगाम जरूरी है। देश भर में अलग-अलग आधार पर बढ़ रही भेदभाव की प्रवृत्ति पर अंकुश केलिए सांप्रदायिक और लक्षित हिंसा (न्याय और पुनर्वास तक पहुंच) विधेयक 2011 को संसद में पारित किया जाना चाहिए। जगत तारन गर्ल्स डिग्री कालेज सभागार में दो दिनी सेमिनार केपहले दिन जुटे सामाजिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों सहित अनेक राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों ने समर्थन में पुरजोर आवाज उठाई।
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विषय प्रवर्तन करते हुए मशहूर सामाजिक कार्यकर्ता और विधेयक की मसविदा समिति की सदस्य तीस्ता सीतलवाड़ ने कहा, आज देश में बहुसंख्यकवाद हावी है। आज अल्पसंख्यक, दलित आदि लगातार हिंसा का शिकार हो रहे हैं। वहीं सरकारें भी उनके विकास में बाधक बनती जा रही हैं। इस विधेयक को पारित कराना यूपीए सरकार के एजेंडे में ही था। आज सरकार में शामिल लोग ही इसका विरोध कर रहे हैं। हैरत तो यह भी कि गुजरात दंगे के 117 आरोपियों को सजा मिली लेकिन मुख्य आरोपी प्रधानमंत्री की होड़ में है। और अंत में, प्रलेस से जुड़े लोगों को भी मंच और विमर्श का हिस्सा बनना चाहिए था।
गुजरात के पूर्व डीजीपी आरबी श्रीकुमार ने कहा, कोई भी सच्चा हिंदू या मुसलमान कभी भी दंगाई नहीं हो सकता है। जहां तक दंगों का सवाल है, उसे सिर्फ दो घंटे के भीतर रोका जा सकता है किंतु आज अधिकतर मामलों में नौकरशाही राजनीतिक दलों के हितों की स्वार्थपूर्ति में ही जुटी है। आज तमाम राजनीतिक दल सांप्रदायिकता का जहर बोने और समाज को बांटने में जुटे हैं। प्रगतिशील लेेखक संघ के राष्ट्रीय महासचिव प्रोफेसर अली जावेद ने आरोप लगाया कि सरकार ही सांप्रदायिकता को बढ़ावा देकर समाज को बांटती है, आमजनता को इससे सजग रहना होगा। वरिष्ठ अधिवक्ता फरमान नकवी ने कहा, वर्तमान कानून अपर्याप्त है, मौजूदा विधेयक प्रभावी कानून बन सकता है और इसे पहले राज्य सभा में पेश किया जाना चाहिए।
कामरेड जियाउल हक ने सलाह दी कि राह से भटके मुस्लिम नौजवानों को सही दिशा देने की जरूरत है। सहअध्यक्ष रविकिरन जैन ने कहा, यह कानून बना होता तो तोगड़िया के दौरे और अयोध्या की घटनाओं को रोका जा सकता था। सीपीआईएम की राज्य कमेटी के सचिव प्रकाश कश्यप ने साफ किया, धार्मिकता, सांप्रदायिकता अलग-अलग बातें हैं, हमारी लड़ाई सांप्रदायिकता के खिलाफ है।
विमर्श में वरिष्ठ पत्रकार शीतला सिंह, पूर्व महाधिवक्ता एसएमए काजमी सहित प्रो सीएल हरदानिया, उमेश नारायण शर्मा, परवेज परवाज, कोमू सोहार्दा वैदिक, मौलाना अजहरी, फरीद शेख, प्रो आलोक राय, प्रो ललित जोशी आदि ने भी विधेयक के पक्ष और इसकी खूबियों की चर्चा की। संचालन केके राय ने किया। कार्यक्रम में जफर बख्त, अंशु मालवीय, उत्पला, प्रो.एए फातमी, प्रो.अनिता गोपेश, डॉ.उर्मिला जैन, अविनाश मिश्र आदि मौजूद थे।
‘इंसाफ सबके लिए’ की सांगीतिक संध्या केतहत मशहूर गायक महमूद खान, रफी खान और साबिर हुसैन ने अपनी सुरीली प्रस्तुतियों से सभी को मंत्रमुग्ध किया। सेमिनार से इतर कालेज परिसर में एक प्रदर्शनी भी लगाई गई जिसमें शब्दों और चित्रों के माध्यम से देश की साझी संस्कृति और इसके स्वरूप को बखूबी रेखांकित किया गया। कबीर, निराला, जहीर सहित अनेक रचनाकारों की पंक्तियां संस्कृति का सच बताती रहीं। वहीं इतिहासबोध, संवाद, न्याय सबके लिए आदि के पर्चे और पत्रिकाओं ने भी माहौल बनाने में मदद की।
‘इंसाफ सबके लिए’ के तहत जवाबदेही और सजा तय करने के लिए छेड़ी गई मुहिम के तहत रविवार को ‘सांप्रदायिकता से कैसे लड़ें’ विषय पर जगततारन गर्ल्स डिग्री कालेज सभागार में सुबह 9.30 बजे संगोष्ठी होगी। इसी क्रम में प्रयाग संगीत समिति में दिन में तीन बजे जनसभा होगी। इंसाफ सबके लिए से मुद्दों पर मतभेद को लेकर किनारा किए संगठन प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय महासचिव प्रोफेसर अली जावेद सहित कई अन्य सदस्यों ने भी सेमिनार में शिद्दत के साथ भागीदारी दर्ज कराई। ‘अमर उजाला’ से बातचीत में उन्होंने कहा कि मुद्दों और तरीकों को लेकर भले ही मतभेद हो लेकिन एक बुद्धिजीवी होने के कारण उन्हें व्यक्तिगत रूप से सम्मेलन में शामिल होना जरूरी लगा। सेमिनार के दौरान गुजरात टेप प्रकरण पर पूछे गए एक सवाल के जवाब में गुजरात के पूर्व डीजीपी आरबी श्रीकुमार ने कहा, टेप प्रकरण में गृह सचिव सहित मंत्रालय की मिलीभगत से इनकार नहीं किया जा सकता लेकिन यह जरूरी नहीं कि इसमें मुख्यमंत्री भी शामिल हों।
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