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काम के बोझ ने रेलकर्मियों को बनाया दिल का रोगी

Allahabad Updated Mon, 25 Feb 2013 05:30 AM IST
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इलाहाबाद। केस एक: मंडल रेल प्रबंधक कार्यालय के कार्मिक शाखा में ओएस-2 रहे डीके मालवीय एक दिन सुबह दफ्तर पहुंचे। कई दिनों से उनके पास फाइलों का ढेर था। काम निपट नहीं रहा था। फटकार पड़ रही थी। उस दिन उनके साथ चल रहे एक सहयोगी ने बताया कि काम के बारे में सोचते, बात करते हुए कार्यालय की सीढ़ी चढ़ रहे थे कि अचानक अचेत हो गए। अस्पताल में उनकी मौत हो गई। बाद में पता चला कि उन्हें दिल का दौरा पड़ा था।
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केस दो: मंडल रेल प्रबंधक कार्यालय के लेखा विभाग में एसओ आरके सिंह पेंशन का काम संभालते थे। सेक्शन के कई कर्मचारियों के रिटायर होने और कुछ का तबादला दूसरे विभागों में होने के कारण उन पर प्रेशर बढ़ गया था। एक दिन कार्यालय से शाम को घर पहुंचे। रात में दिल का दौरा पड़ा। सुबह अस्पताल में भर्ती कराया गया लेकिन वह दोबारा न घर, आफिस नहीं लौट सके।
केस तीन: डिवीजन में ही लेखा सहायक रहे प्रदीप खरे दफ्तर में कार्य की अधिकता से इस कदर परेशान थे कि अकसर लोगों से उनका झगड़ा हो जाता था। काफी चिड़चिड़े हो गए थे। जांच में पता चला कि हाई ब्लड प्रेशर और शुगर है। लंबी बीमारी, इलाज के बाद पिछले साल एक दिन में कार्यालय में बेहोश होकर गिर पड़े। रेलवे अस्पताल में भर्ती कराया गया लेकिन डॉक्टर उन्हें नहीं बचा सके।
केस चार: इलाहाबाद डिवीजन की इंजीनियरिंग शाखा में सीओएस रहे रमेश चंद्र श्रीवास्तव को कार्यालय में ही दौरा पड़ा। दौरा इतना गंभीर था कि अस्पताल ले जाने की नौबत ही नहीं आई। कार्यालय परिसर में ही उन्होंने दम तोड़ दिया। उन्होंने कई बार विभागीय अधिकारियों से शिकायत की थी कि उनके पास काम की अधिकता है लेकिन किसी ने ध्यान नहीं दिया।
काम की अधिकता से कर्मचारियों की मौत के ये चार मामले नमूने भर हैं। शाखा मंत्री दीपक वर्मा का दावा है कि डिवीजनल कार्यालय में करीब 20 कर्मचारियों की मौत ह्रदयाघात से हुई। कई दफे यह मुद्दा बैठकों में उठाया गया लेकिन अफसर रिक्त पदों को भरने के लिए तैयार नहीं होते। कार्य की अधिकता का आलम यह है कि सैकड़ों ऐसे पद हैं जहां दो या तीन कर्मचारी होने चाहिए लेकिन एक को ही रगड़ा जा रहा है। आरके सिंह की मौत के बाद वही काम तीन कर्मचारी कर रहे हैं।
हालत इससे भी ज्यादा गंभीर है। रेलवे अस्पताल के डॉक्टरों का दावा है कि पिछले सालभर में अस्पताल में रजिस्टर्ड किए गए मरीजों में 55 फीसदी हार्ट या शुगर के हैं। सालभर में रेलवे के जोनल अस्पताल में 38 हजार कर्मचारियों ने इलाज कराया है। एनसीआरएमयू के मंडल मंत्री एसएन ठाकुर कहते हैं कि संरक्षा श्रेणी के कर्मचारियों को बेहद तनाव में काम करना पड़ रहा है। स्टेशन मास्टर, ट्रेन चालक, गार्ड समेत ग्रुप सी और डी में 10 हजार से ज्यादा पद रिक्त हैं। इनका बोझ काम करने वाले कर्मचारियों पर है। नतीजा, वक्त पर छुट्टी नहीं मिलती। कार्य के घंटे बढ़ गए हैं। इलाज की बेहतर सुविधा न मिलने से बीमारों की संख्या लगातार बढ़ रही है।
एआईआरएफ के उपाध्यक्ष आरडी यादव का दावा है कि एनसीआर के जोनल अस्पताल में ह्रदय रोग का कोई विशेषज्ञ डॉक्टर नहीं है। ब्रांडेड दवाएं भी नहीं मिलतीं। पिछले साल धनाभाव में कर्मचारियों को इलाज में भी काफी परेशानी हुई। एसजीपीजीआई और अपोलो जैसे अस्पतालों में कर्मचारी इलाज नहीं करा सके। कर्मचारी नेताओं का कहना है कि नए रेल बजट के पहले रेलमंत्री के सामने इस समस्या को उठाया गया है। उम्मीद है कि रेलमंत्री बजट में कर्मचारियों पर काम का बोझ कम करने और उनके इलाज को लेकर बजट में कोई व्यवस्था जरूर करेंगे।
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