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प्रत्यक्षदर्शी का साक्ष्य संदेह से परे होना जरूरी

Allahabad Updated Fri, 28 Dec 2012 05:30 AM IST
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इलाहाबाद। हत्या के मुकदमे में गवाही दे रहे चश्मदीद गवाह का बयान संदेह से परे साबित होना आवश्यक है। यदि बयान से घटना की सत्यता संदिग्ध होती है तो इसका लाभ अभियुक्त को मिलेगा। इस निरीक्षण के साथ न्यायमूर्ति राकेश तिवारी और न्यायमूर्ति एके शर्मा की खंडपीठ ने 16 साल पुराने डकैती और हत्या के मुकदमे में नामजद अभियुक्तों को बरी कर दिया। इन दस अभियुक्तों को अपर जिला जज कन्नौज ने उम्रकैद और दस-दस हजार रुपए जुर्माने की सजा सुनाई थी।
प्रकरण के मुताबिक फर्रुखाबाद के सौरिख थानाक्षेत्र में खादिनी गांव के स्वर्णकार रामबाबू के घर में 14 अप्रैल 1996 की रात दर्जन भर लोगों ने लूटपाट की। विरोध करने पर उसके छोटे भाई श्यामबाबू की पत्नी रानीदेवी की हत्या कर दी गई। अन्य लोग गंभीर रूप से घायल थे। घटना की रिपोर्ट अगले दिन 15 अप्रैल को लिखाई गई। रामबाबू ने प्रताप, रामविलास, मोहर सिंह, प्रकाश, सुभाष, इतवारी, नगरिया और दिनेश के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई। बताया कि यह लोग उसकी दुकान पर आया जाया करते थे, इसलिए उनको पहचानता है। अपील पर सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि गवाह रामबाबू नामजद अभियुक्तों की मौजूदगी को साबित करने में नाकाम रहा है। घटना के तथ्य, परिस्थितियों और साक्ष्यों से भी यह नहीं साबित हो सका कि नामजद अभियुक्त ही डकैती में शामिल रहे। इन आधारों पर न्यायालय ने अभियुक्तों को उम्रकैद और जुर्माने की सजा से मुक्त कर दिया।
हत्या का जुर्म साबित करने के लिए हत्या करने का उद्देश्य तब जरूरी है जबकि चश्मदीद गवाह की घटना स्थल पर मौजूदगी संदिग्ध है। देर से दर्ज कराई गई प्राथमिकी भी इस संदेह को बढ़ावा देती है कि आरोपी के खिलाफ साक्ष्य गढ़ने का प्रयास हुआ है। इस निरीक्षण के साथ न्यायमूर्ति राकेश तिवारी और न्यायमूर्ति एके शर्मा की खंडपीठ ने सोनभद्र जिले में महिला की हत्या के आरोपी लालबिहारी यादव को दोष मुक्त कर दिया। लाल बिहारी को निचली अदालत ने उम्रकैद की सजा सुनाई थी। वादी धर्मराज गौड़ की पत्नी सोनमतिया की एक अप्रैल 2007 को हत्या कर दी गई। कोन थाने के कछनरवा टोला के लाल बिहारी यादव पर हत्या का दोष लगाया गया। निचली अदालत ने उसे उम्रकैद की सजा सुनाई। अपील पर विचार करते हुए खंडपीठ ने कहा कि अभियुक्त के पास हत्या करने का क्या उद्देश्य था यह साबित नहीं है। प्राथमिकी भी देर से लिखाई गई। चश्मदीद गवाहों की घटनास्थल पर मौजूदगी भी संदिग्ध है।

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