संतों में जाति, जमीन की जंग से श्रद्धालु आहत

Allahabad Updated Tue, 25 Dec 2012 05:30 AM IST
इलाहाबाद। ‘तीरथपतिहि आव सब कोई’ के आग्रह के साथ संगम की रेती पर आस्था की डुबकी लगाने और तंबुओं की नगरी में ठौर के लिए सभी को बिना भेदभाव निमंत्रण दिया जाता है, पर अबकी कुंभ मेले की शुरुआत में ही विवादों का ग्रहण लग गया है। कहते हैं, ‘जाति न पूछो साधु की लेकिन फिलहाल मेला जाति, पद और जमीन आदि के मुद्दों की भेंट चढ़ गया है। साधु, संतों में जाति और जमीन की जंग से श्रद्धालु और विभिन्न तबके से जुड़े लोगों में भी चिंता और हैरानगी है।
संतों के बीच जातिसूचक लड़ाई से दुखी पद्मश्री शम्सुर्रहमान फारुकी का कहना है कि मेले का मूल मकसद कहीं गुम होता जा रहा है। यह आस्था, विश्वास और एकजुटता का संगम था, सभी एक आस्था के वशीभूत होकर यहां आते थे, पर अब उन्हीं विचारों में मतभेद उचित नहीं। वरिष्ठ कथाकार दूधनाथ सिंह जाति और जमीन को लेकर छिड़ी जंग से आहत हैं। उनका कहना है कि शंकराचार्यों, अखाड़ों, संतों को शिविर के लिए अच्छी जगह मिलनी चाहिए लेकिन इसके लिए लड़ाई हो और इस कदर हो कि बात जाति और असली नकली पर आ जाए तो दुखद है।
स्टेट फोरम ऑफ फिजिशियन्स के अध्यक्ष और वरिष्ठ चिकित्सक डॉ.एके आहूजा अर्द्धकुंभ में दस दिन संगम क्षेत्र में रह चुके हैं। इस बार जमीन और जाति धर्म के विवाद से दुखी हैं। उनके मुताबिक संतों से लोग सीख लेते हैं। श्रद्धालु उन्हें घंटों सुनते हैं, उस पर अमल करते हैं लिहाजा संतों के मुंह से इस तरह की बयानबाजी ठीक नहीं है।
श्री गुरु सिंह सभा के प्रधान सरदार जोगिंदर सिंह के मुताबिक साधुओं से पहले उनका त्याग, अहंकार आ पहुंचा है। उनमें ऐसी जगह के लिए मतभेद है, जिसे माह भर बाद उन्हें छोड़कर उन्हें चले जाना है। साधु का मतलब क्रोध सहित सभी चीजों का त्याग है जो अब गुम होता जा रहा है। उन्हें ध्यान देना होगा कि समाज उनसे सीखता है।
कर एवं वित्त सलाहकार पवन जायसवाल का कहना है कि उनसे जुड़े सैकड़ों लोग दूसरे शहरों, राज्यों से कुंभ में पहुंचने वाले हैं। उन तक शंकराचायों के बीच विवाद की बात पहुंच रही है तो सभी दुखी हैं। शंकराचार्य जाति की बात करेंगे तो श्रद्धालुओं को समाज में एकता की सीख कैसे दे सकेंगे।
सुपरिचित समाजशास्त्री और सीएमपी महिला शाखा की प्रभारी डॉ.हेमलता श्रीवास्तव के मुताबिक धर्म में भौतिकता का कोई स्थान नहीं लेकिन इस पर कुंभ में भौतिक संस्कृति हावी होती जा रही है। राजनीतिज्ञों की तरह साधु-महात्माओं में भी पद, प्रतिष्ठा की होड़ है, त्याग की बातें हाशिये पर हैं। सभी को चाहिए कि कुंभ की संस्कृति बची रहे।

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