घटियापन के लिए सिनेमा नहीं समाज जिम्मेदार

Allahabad Updated Thu, 13 Dec 2012 05:30 AM IST
इलाहाबाद। समाज में फैल रही विद्रूपता, हर स्तर पर घटियापन के लिए भले ही लोग फिल्मों को जिम्मेदार ठहराएं लेकिन मशहूर गीतकार और पटकथा लेखक जावेद अख्तर ऐसा नहीं मानते। इलाहाबाद संग्रहालय में बुधवार को भारतीय सिनेमा के सौ बरस का हाल सुनाने पहुंचे जावेद अख्तर ने दो टूक कहा कि घटियापन के लिए सिनेमा नहीं बल्कि समाज जिम्मेदार है। बदलते सिनेमा पर सिलसिलेवार हिन्दुस्तान का हाल भी बयां किया। सिनेमा के बहाने देश और समाज की तहज़ीब, इसकी रवायत, रवानगी और रफ्ता-रफ्ता रास्ता बदलते मूल्यों और जरूरतों का भी जिक्र किया।
उन्होंने सिनेमा में आ रहे उतार-चढ़ाव के साथ इसके घटियापन को पूरे मन से स्वीकार किया, पर इसका ठीकरा समाज के सिर पर फोड़ा। जावेद ने कहा, किसी घटिया या सस्ते गाने को लिखने और प्रस्तुत करने वाले चंद लोग हो सकते हैं, पर उन्हें शोहरत दिलाने वाला समाज होता है। इसी समाज ने ऐसे ‘एंग्री यंग मैन’ को दिया, जिसे लोकतंत्र की संस्थाओं के प्रति कोई आस्था नहीं, वह अपना रास्ता, अपना इंसाफ खुद पाना चाहता है।
इसी समाज ने द्विअर्थी गीतों और स्टंट वाली फिल्मों को भी पसंद किया और यही समाज आज बिना अर्थ वाले गीतों को भी सुपरहिट कर रहा है। सामाजिक मूल्यों और जरूरतों के मुताबिक हीरो तैयार होते रहे। बदलते दौर का ही तकाजा है कि अब सिनेप्लेक्स में चंद दर्शकों के लिए ही फिल्में बनाई जा रही हैं, एक बड़ा समाज उपभोक्ता नहीं रह गया। सिर्फ फिल्में ही नहीं हर चीज पैकेज में परोसी जा रही है जिसमें अच्छी-बुरी दोनों का मिश्रण होने के कारण उसे समझना मुश्किल हो रहा है।
इसके बावजूद जावेद ने माना कि नई पीढ़ी फिर सिनेमा को समृद्ध करेगी। फिर अच्छी फिल्मों का दौर आएगा। इलाहाबाद संग्रहालय परिसर में कुमारस्वामी स्मृति व्याख्यानमाला के तहत व्याख्यान से पहले उन्होंने भारतरत्न पंडित रविशंकर के निधन पर शोक व्यक्त किया। एक मिनट का मौन रख उन्हें याद किया। पूर्व महाधिवक्ता एसएमए काजमी, प्रोफेसर एए फातमी ने विषय पर अपनी बात रखी। संग्रहालय के निदेशक राजेश पुरोहित ने स्वागत और डॉ.राजेश मिश्र ने संचालन किया।
0 कंजूसी से अदा किया शुक्रिया, प्रशंसक निराश
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इलाहाबाद। अपनी तमाम नामचीन फिल्मों के नायक बिग बी अमिताभ बच्चन के शहर में आए गीतकार जावेद अख्तर से शहरियों को उम्मीद थी कि वह अमिताभ बच्चन सहित शहर की अदबी और गंगा-जमुनी तहजीब और इसकी खूबियों का भी जिक्र करेंगे, पर बहुत कंजूसी के साथ शहर का शुक्रिया अदा करके वह अपने मुद्दे पर लौट आए। जावेद बस इतना ही बोले, मेरी तमाम नामचीन फिल्मों का हीरो तो आपने ही दिया, कोई और हो तो भेजिएगा।
वापसी में प्रशंसकों ने बात करने और युवाओं ने आटोग्राफ की कोशिश की, पर ज्यादातर को निराशा ही हाथ लगी। कार्यक्रम का दूसरा सत्र उनका रचनापाठ था, पर एक कविता अपने मन की और एक फरमाइश सुनाकर वह मंच से उतरे और पल भर भी रुके बिना वहां से निकल पड़े। मीडिया से बातचीत में भी उन्होंने इलाहाबाद और कुंभ से जुड़े सवालों का संक्षिप्त सा जवाब दिया।

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