नई चाल के चंगुल में अटकी अखाड़ों की एका

Allahabad Updated Sat, 01 Dec 2012 12:00 PM IST
इलाहाबाद। महाकुंभ के सिरमौर अखाड़ों की एका अब नई चाल में अटक कर रह गई है। माया या सत्ता के मोह से दूर रहने का दावा करने वाले अखाडे़, अब तक पद के मोह से ही मुक्त नहीं हो पा रहे हैं। कौन का पद संन्यासी तो कौन सा वैरागी अखाड़े के हिस्से में जाए, इस बात को लेकर नई बहस छिड़ी हुई है। अब तक सात अखाड़ों की परिषद के अध्यक्ष की कमान जिस निर्मल अखाड़े को सौंपी गई है, उसे जूना, अग्नि और आवाहन की तरह अपना सहयोगी ही मानता है।
हरिद्वार कुंभ के बाद मठ बाघंबरी गद्दी में सात अखाड़ों की मौजूदगी में हुए परिषद के चुनाव में अध्यक्ष पद निर्मल और महामंत्री आनंद अखाड़े के खाते में आया था। माना जा रहा था कि बाकी अखाडे़ भी देर-सबेर इसमें शामिल हो जाएंगे, पर पहले निर्वाणी अणी और बाद में जूना की जिद के आगे यह संभव नहीं हो सका। अब जूना ने चुनाव का मुद्दा संन्यासियों के पाले में डाल दिया है। इसी तरह जूना और निर्मल दोनों ही गुट, वैष्णव अखाड़ों के समर्थन को लेकर अलग-अलग दावे कर रहे हैं।
जूना के सचिव श्रीमहंत हरिगिरि यह तो मानते हैं कि परिषद के चुनाव में सभी अखाड़ों को शामिल किया जाएगा पर वह यह कहना नहीं भूलते कि संन्यासियों का फैसला सर्वोपरि होगा। फिलहाल परिषद के चुनाव में ‘संन्यासी कार्ड’ सबसे ऊपर है। इसके मुताबिक अब तक संन्यासियों के हिस्से में महामंत्री पद था सो अब उन्हें अध्यक्ष पद मिलना चाहिए जिसका फैसला महानिर्वाणी, निरंजनी और जूना करेगा। निर्मल गुट के अखाड़ों ने जूना के प्रस्ताव को परिषद में फूट डालने की कोशिश करार दिया है। बकौल महंत हरिगिरि बीते कुंभ तक बड़ा, नया और निर्मल अखाड़ा, इनके पीछे रहता था।
वहीं सात अखाड़ों की परिषद के प्रवक्ता और बड़ा उदासीन के मुखिया महंत दुर्गादास के मुताबिक अपनी-अपनी जिद पर अड़े अखाड़ों के कारण एका की कोशिशें कमजोर हुई हैं। निरंजनी के सचिव महंत नरेंद्र गिरि के मुताबिक यदि अखाड़े एक होते तो जूना का भूमि पूजन भी उसकी तिथि पर मेले में ही होता, मौजगिरि में नहीं। अखाड़ों की जिद से ही एका के प्रयास बेमानी हो रहे हैं। मेले के पहले एका न हुई तो इसका सीधा असर कुंभ की तैयारियों पर पड़ना तय है।

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