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रसूखवाले कर्मचारियों के आगे बेबस हुए मेलाधिकारी

Allahabad

Updated Fri, 30 Nov 2012 12:00 PM IST
इलाहाबाद। कुंभ, अर्द्धकुंभ और माघ मेला में जमीन एवं सुविधा आवंटन के नाम पर जमकर घपला होता रहा है। संस्थाओं को जमीन आवंटित की गई लेकिन सुविधा नहीं। नियमों को ताक पर रखकर कई गैर आबाद संस्थाओं को जमीन आवंटित कर दी गई। इन गड़बड़ियों से मेला प्रशासन भी अनजान नहीं है। कमिश्नर और मेलाधिकारी खुद इस बात को मानते हैं कि पूर्व में ऐसी गड़बड़ियां होती रही हैं लेकिन इस सवाल का जवाब उनके पास भी नहीं कि इन गड़बड़ियों को अंजाम देने वालों में कुछ कर्मचारियों को इस बार भी कुंभ में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी क्यों दी गई। कुंभ मेलाधिकारी मणि प्रसाद मिश्र का कहना है कि ऐसे कर्मचारियों से काम लेना उनकी मजबूरी है। उनके पास कोई दूसरा तंत्र नहीं है।
मेलाधिकारी की इस मजबूरी से साबित होता है कि रसूखवाले कर्मचारियों के आगे प्रशासन ने घुटने टेक दिए हैं। मेला शासन चला रहा है या कुछ कर्मचारी। बृहस्पतिवार को कमिश्नरी के गांधी सभागार में कुछ से जुड़ी प्रेस वार्ता के दौरान जब यह सवाल उठा तो कमिश्नर देवेश चतुर्वेदी ने ऐसे कर्मचारियों का नाम जानना चाहा। मेलाधिकारी ने तुरंत तीन बाबुओं के नाम लिए लेकिन यहां बात सिर्फ एक कर्मचारी की हो रही थी जो संस्थाओं, अखाड़ों को जमीन-सुविधा का आवंटन अपने हिसाब से करता है। आखिर दो अन्य कर्मचारियों का नाम बेवजह क्यों लिया गया? फिलहाल मंशा कुछ भी रही हो लेकिन मेलाधिकारी के जवाब से यह तो स्पष्ट हो गया कि वह उस बाबू के आगे वह और पूरा मेला प्रशासन पूरी तरह से बेबस है जबकि उसी बाबू ने इस कुंभ में अपने फायदे के लिए कई संस्थाओं की फाइलें दबा रखी हैं और मेला क्षेत्र में सेक्टर कार्यालय के लिए चयनित जमीन किसी और को आवंटित करने पर उतारू है। मेलाधिकारी ने यह कहते हुए कर्मचारी का बचाव भी किया कि पूर्व में जो कुछ हुआ, उसमें सभी भागीदार थे। प्रशासन से लेकर शासन तक सभी की बराबर की भागीदारी रही है लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। संस्थाओं से जुड़ी सभी जानकारी ऑनलाइन की जाएंगी ताकि भविष्य में इस तरह की गड़बड़ियां न हों लेकिन एक सवाल अनुत्तरित ही रह गया कि इस बार के कुंभ में गड़बड़ी कैसे रोकी जाएगी? कमिश्नर देवेश चतुर्वेदी ने इस सवाल का जवाब देने की कोशिश की। कहा, ‘वह कुंभ से जुड़े कर्मचारियों और अधिकारियों से अक्सर कहते हैं कि मेला जीवन का अंत नहीं है। अच्छा काम करें, वरना जीवन दुखदायी होगा।’
वेबसाइट के नाम भी पर हुआ ‘खेल’
मेला क्षेत्र में प्रशासन कुछ अभिनव प्रयोग करने का दावा कर रहा है। इसी के तहत कुंभ में धार्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, शैक्षणिक, राजनीतिक संस्थाओं, स्वैच्छिक संस्थाओं, नागरिक संगठनों और अन्य पंजीकृत दी जाने वाली जमीन एवं सुविधा की संबंधित सभी जानकारी कंप्यूटरीकृत करते हुए मेला प्रशासन की वेबसाइट पर ऑनलाइन किया जाएगा लेकिन यह काम कब पूरा होगा, इसका जवाब किसी के पास नहीं। शुरुआत में 60 लाख रुपए की लागत वाला एक प्रोजेक्ट तैयार किया गया था, जिसके तहत ‘तीर्थराज प्रयाग’ नाम से वेबसाइट तैयार की जानी थी। इसका जिम्मा एक निजी संस्था को सौंपा गया। इंजीनियर ने इस वेबसाइट पर तमाम महत्वपूर्ण जानकारियां अपलोड करने के लिए जब मेला प्रशासन से सूचनाएं मांगी तो कुछ कर्मचारी आनाकानी करने लगे। फाइलें गुम होने लगीं। आखिर में इस वेबसाइट से जुड़ा प्रोजेक्ट वापस ले लिया गया और वेबसाइट अब तक आधी-अधूरी पड़ी है। इसकी जगह मेला प्रशासन ने ‘कुंभ मेला इलाहाबाद’ नाम से दूसरी वेबसाइट लांच की और कहा कि यह अधिकृत वेबसाइट है लेकिन अब इसमें भी कई महत्वपूर्ण जानकारी अपलोड करने से मेला प्रशासन कतरा रहा है। ऐसे में प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं। वेबसाइट सरकारी एजेंसी एनआईसी तैयार कर रही है।
पहले अपने ‘घर’ की गंदगी करनी होगी साफ
प्रशासनिक अफसरों को पीडब्ल्यूडी, नगर निगम, गंगा प्रदूषण नियंत्रण इकाई की ओर से कराए जा रहे कार्यों में तो कमी नजर आ रही है लेकिन अपने कार्यालय में चल रहा ‘खेल’ किसी को नहीं दिख रहा। मेला प्रशासन हो या जिला प्रशासन, पहले उसे अपने घर की गंदगी साफ करनी होगी। जमीन और सुविधा आवंटन की आड़ में गड़बड़ी करने वालों पर लगाम कसनी होगी और ऐसे लोगों पर सख्त कार्रवाई भी करनी होगी।
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