छिन सकती है निगम अध्यक्षों की लालबत्ती

Allahabad Updated Sun, 11 Nov 2012 12:00 PM IST
इलाहाबाद। कागज पर चल रहे निगमों के अध्यक्ष/ उपाध्यक्ष पद पर बैठ मलाई खा रहे कई रसूखदार लोगों की लालबत्ती गाड़ियां छिन सकती हैं। हाईकोर्ट ने प्रदेश में चल रहे तमाम निगमों की जांच का आदेश दिया है जिनका जमीन पर कोई अस्तित्व नहीं है। न्यायालय ने कहा है कि ऐसे निगम कुछ चहेतों को उपकृत करने के लिए चलाए जा रहे हैं ताकि उनको लालबत्ती और राज्यमंत्री की सुविधाएं दी जा सकें। जनता की गाढ़ी कमाई के पैसे का इस प्रकार से दुरुपयोग करने का सरकारों को कोई हक नहीं है। न्यायालय ने प्रमुख सचिव से इस पर छह माह में रिपोर्ट मांगी है।
बुंदेलखंड विकास निगम की याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल ने पाया कि यह निगम सालों से मात्र कागज पर चल रहा है। इसके अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के वेतन, भत्तों और सुविधाओं पर सरकार हर साल लाखों रुपये खर्च कर रही है। जबकि निगम ने एक भी ऐसा काम नहीं किया जिससे जनता को फायदा मिल सके। उलटे निगम करोड़ों के घाटे में चल रहे हैं। निगम में जमीनी काम करने वाले किसी कर्मचारी की तैनाती तक नहीं की गई है। न्यायमूर्ति अग्रवाल ने कहा कि निगम के अध्यक्ष की नियुक्ति करने के सरकार के अधिकार की भी जांच की जानी चाहिए। सरकार किसी प्राइवेट कंपनी की तरह व्यक्ति विशेष को लाभ पहुंचाने के लिए जनता के धन का उपयोग नहीं कर सकती है। न्यायालय ने बुंदेलखंड विकास निगम के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और निदेशकों पर खर्च की गई धनराशि उनसे वसूल करने को भी कहा है। साथ ही निगम पर 25 हजार रुपये का हर्जाना लगाया है।
किरायेदारी विवाद को लेकर हाईकोर्ट पहुंचे बुंदेलखंड विकास निगम की पोल उस वक्त खुल गई जबकि न्यायालय ने निगम की स्थापना, उसके कार्यों और आय के स्रोतों की जांच प्रारंभ कर दी। पता चला कि 11 नवंबर 1992 को प्रदेश सरकार ने करोड़ों रुपये के घाटे में चल रहे बुंदेलखंड विकास निगम को बंद करने का निर्णय लिया। इसके बावजूद निगम ने न तो सिविल लाइंस, झांसी स्थित किराये के भवन को खाली किया और न ही पूरी तरह से इसे समाप्त किया। इतना ही नहीं निगम को इस दौरान प्रदेश सरकार से कोई आर्थिक मदद नहीं मिली। अधिकारियों ने बताया कि निगम अपनी संपत्तियां बेचकर खर्च चलाता रहा। हालांकि न्यायालय के पूछने पर वह यह नहीं बता सके कि कौन सी संपत्तियां बेची गई। इस दौरान किन लोगों को तनख्वाह दी गई यह भी अधिकारी नहीं बता सके।
वर्ष 2008 में राज्य सरकार ने एक निर्णय लेते हुए बुंदेलखंड विकास निगम को फिर से शुरू करने का निर्णय लिया। इसे ग्राम्य विकास विभाग के अधीन कर दिया गया। रमेश कुमार शर्मा को इसका अध्यक्ष बनाया गया जिनको राज्यमंत्री की सुविधाएं और वेतन-भत्ते आदि देने का प्राविधान किया गया। भैरों प्रसाद और जगन्नाथ को उपाध्यक्ष तथा कमिश्नर झांसी मंडल को निदेशक बनाया गया। तय किया गया कि इन अधिकारियों को आयुक्त ग्राम्य विकास के बजट से वेतन आदि दिया जाएगा। न्यायालय ने कहा कि वर्ष 2008 से अबतक निगम ने कोई काम नहीं किया। काम करने वाले किसी कर्मचारी की नियुक्ति भी नहीं की गई। मात्र अध्यक्ष और उपाध्यक्ष की नियुक्ति कर उनको सुविधाएं दी जा रही हैं।

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