पीने के पानी को भी तरसेंगे लोग

Allahabad Updated Tue, 06 Nov 2012 12:00 PM IST
इलाहाबाद। पेयजल के लिए आने वाला समय बहुत ही भयावह होने वाला है। लोगों को पानी के लिए और संघर्ष करना पड़ेगा। शोध के बाद विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि 2050 तक देश में पेयजल की उपलब्धता आधी ही रह जाएगी। वैज्ञानिकों ने विदेशी मछलियों से भी जलीय संपदा तथा लोगों का स्वास्थ्य खतरे में पड़ने की चेतावनी दी है।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्राणि विज्ञान विभाग की ओर से सोमवार को शुरू तीन दिवसीय कार्यशाला में आए दून विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. पीके जैन ने वर्षों के शोध के आधार पर बताया कि वातावरण में पाए जाने वाले प्राकृतिक संसाधन बहुत तेजी से सिमट रहे हैं। उन्होंने बताया कि 1951 तक देश में 5177 क्यूसेक मी. पेयजल था जो 2000 में घटकर मात्र 2000 क्यूससेक मी. रह गया है। चेतावनी दी कि जिस तरह से संधासन सिमट रहे हैं, उसके अनुसार 2050 तक मात्र 1140 क्यूसेक मी. पेयजल ही बचेगा। उन्होंने ग्लेशियर पिघलने, समुद्र तल बढ़ने तथा बाढ़ से जैव विविधता के तेजी से नष्ट होने की बात भी कही।
मुख्य अतिथि फिशरीज डेवलपमेंट कमिश्नर डॉ. बी. विष्णु भट्ट ने विदेशी मछलियों से होने वाले खतरों के प्रति आगाह किया। बताया कि इसकी वजह से मछलियों की स्थानीय प्रजातियों को खतरा उत्पन्न हो गया है। रिसर्च में यह बात भी समाने आई है कि विदेशी मछलियों को खाने से लोगों के स्वास्थ्य पर भी खराब असर पड़ा है। डॉ. भट्ट ने बताया कि लोगों के स्वास्थ्य और प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मछली का महत्वपूर्ण योगदान है। इसके मद्देनजर विदेशी मछलियों के प्रजनन के लिए नए मापदंड बनाए गए हैं। कार्यशाला में भी इस खतरे तथा इससे निजात पर चर्चा की जाएगी। साथ में भविष्य की योजनाओं का खाका तैयार किया जाएगा। उन्होंने बताया कि बारहवीं पंचवर्षीय योजना में मछलियों का उत्पादन बढ़ाकर 15 मिलियन टन करने का लक्ष्य रखा गया है। अभी 8.40 मिनियन टन उत्पादन हो रहा है। कार्यशाला में प्रो. एनआर फारूखी सहित अन्य विशेषज्ञों ने भी अपने अनुभव साझा किए। प्रो. संदीप मेलहोत्रा ने अतिथियों का स्वागत किया।

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