क्लास में पहुंच जवां हुईं यादें

Allahabad Updated Sun, 04 Nov 2012 12:00 PM IST
इलाहाबाद। मोतीलाल नेहरू राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान में शनिवार को भावनाओं के गुबार के बीच विकास की पटकथा लिखी गई। मौका था संस्थान के पुराछात्र सम्मेलन का। भावुकता से पूर्ण इस माहौल में वर्षों बाद मिले पुराछात्रों ने उत्साह और जोश से एक दूसरे को गले लगाया तो क्लास और हास्टल में जाकर कालेजों के दिनोें की यादें भी जवां हुईं। हालांकि बुधवार को संस्थान के छात्र ललित प्रजापति की डेंगू से हुई मौत को लेकर पुराछात्रों में दुख भी रहा।
1987 बैच के छात्रों का एक समूह, इनके बीच में कुछ जूनियर और सीनियर भी थे, सभी काफी उत्साहित थे। चर्चा के बीच ही एक और साथी दिख गया और उनमें से एक छात्र ने कहा, ‘ऐ वो तो फंटू है, ऐ इधर आ।’ कालेज के दिनों में मिले इस उपनाम को तकरीबन 20 साल बाद सुनने के बाद फंटू का उत्साह भी बढ़ गया। कुछ ही पल में वह भी इस समूह का हिस्सा हो गए। इस तरह का माहौल पूरे परिसर में रहा। कार्यक्रम में 50 साल पहले कालेज छोड़ चुके छात्र-छात्राओं से लेकर वर्तमान में पढ़ाई कर रहे विद्यार्थियों तक की उपस्थिति रही लेकिन सभी अपनी उम्र भूल चुके थे। सीनियर-जूनियर का लिहाज तो था लेकिन पुराछात्र अपने दौर की चुहलबाजी भी साझा करने से नहीं चुके। सभी पुरानी यादों और इस पल को पूरी तरह से जी लेना चाहते थे। बतौर मुख्य अतिथि समारोह में शामिल रमेश मेहान ने कहा भी, जीवन की सबसे सुनहरी यादें समटने का वर्षों बाद यह अवसर मिला है।
उद्घाटन सत्र में निदेशक प्रोफेसर पी. चक्रवर्ती ने पुरा छात्रों से अपील की कि वे केवल आर्थिक रूप से ही नहीं रोजगार का माध्यम बन, कक्षाएं लेकर तथा अन्य गतिविधियों से भी संस्थान की मदद कर सकते हैं। उन्हाेंने कहा कि संस्थान यहां से निकले हर छात्र का है और इसे आगे बढ़ाने का अधिकार भी उनके पास है। निदेशक की अपील का असर भी दिखाई दिया तथा कई पुराछात्रों ने मदद को हाथ बढ़ाया है। समारोह की शाम पार्श्व गायिका ममता शर्मा के नाम रही। ममता की ‘मुन्नी बदनाम हुई’ समेत अन्य प्रस्तुतियों पर पुरनिए भी जमकर थिरके। सम्मेलन में दूसरे दिन पुराछात्र क्लास, हास्टल, शहर आदि का भ्रमण करने के साथ छात्र-छात्राओं से भी रूबरू होंगे।
सम्मानित किए गए पुराछात्र
पुराछात्र सम्मेलन में सिल्वर जुबली बैच (1987) के छात्र-छात्राओं के लिए अलग कार्यक्रम कर उन्हें सम्मानित किया गया। पुराछात्रों ने भी स्वीमिंग पूल के लिए 10 लाख रुपये दिए। छात्र इसके लिए 30 लाख रुपये पहले ही दे चुके हैं। शेष 10 लाख रुपये जल्द देने का वादा किया। उन्होंने संस्थान की हर तरह से मदद का आश्वासन भी दिया। यह पहला मौका था जब सम्मेलन में 220 के बैच में से 100 से अधिक छात्र-छात्राओं ने हिस्सा लिया। इसी क्रम में ‘दोस्ती के पचास वर्ष’ कार्यक्रम के तहत 1961 और 1962 बैच के विद्यार्थियों को भी सम्मानित किया गया। इसके बाद बिजनेस सेशन में एलुमिनियाई एशोसिएशन के कोषाध्यक्ष प्रोफेसर एमडी सिंह ने लेखाजोखा प्रस्तुत किया। साथ में आगे की रणनीति पर भी चर्चा हुई। कार्यक्रम में प्रोफेसर आरपी तिवारी, लव शर्मा, दीपेश तिवारी आदि मौजूद रहे।
छात्रों को ज्ञान बांटेंगे पुरनिए
मिसाइल बनाने, बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियों में काम करने तथा उसे चलाने का सलीका आदि की जानकारियां छात्र-छात्राओं को संस्थान में ही मिलेगी। इतना ही नहीं परमाणु ऊर्जा, परमाणु बम आदि के बारे में भी जानकारी मिलेगी। पुराछात्रों ने इसके लिए खुद पहल की है। वेस्टिंग हाउस न्यूक्लियर कंपनी, अमेरिका के एमडी 1962 बैच के छात्र रहे सुभाष चंद्रा ने संस्थान के सामने एक सुझाव रखा है कि पुराछात्र रोजगार के साथ अनुभव साझा करके भी विद्यार्थियों की मदद कर सकते हैं। उन्होंने इसका प्रस्ताव भी निदेशक को सौंपा। इस पहल के बाद संस्थान में जल्द ही पुरनियों की कक्षाएं शुरू होने की उम्मीद है। इसके अलावा मुख्य अतिथि तथा इनोवेटिव टेकभनोलॉजीज कारपोरेशन के सीईओ 1962 बैच के रमेश राय मेहान ने भी स्कॉलरशिप शुरू करने का प्रस्ताव संस्थान को सौंपा है। उन्होंने कई अन्य तरीके से भी मदद का आश्वासन दिया।
नहीं भूला ट्रेन का वह सफर, संगम का तट
अमेरिका की न्यूक्लियर कंपनी वेस्टिंग हाउस के एमडी सुभाष चंद्रा सैकड़ों दफे हवाई सफर चुके हैं लेकिन संस्थान में बीई की पढ़ाई के दौरान दोस्तों के साथ ट्रेन से भारत भ्रमण का वह सफर उन्हें अब भी नहीं भूला है। पुराछात्र सम्मेलन में आए सुभाष का कहना था कि उन दिनों ट्रेन का सफर सपनों जैसा था लेकिन यहां बोगी बुक कराके छात्र-छात्राओं को भारत भ्रमण कराया जाता था। एमएनएनआईटी संभवत: अकेला संस्थान था जहां हर राज्य के छात्र-छात्राओं के लिए कोटा था। अलग-अलग संस्कृति से जुड़े दोस्तों के साथ भारत की सांस्कृतिक समृद्धि का दर्शन, भावुक होते हुए, बहुत ही सुनहरा सफर था। इस सफर ने दुनियादारी समझने में बहुत मदद की।
मुख्य अतिथि रमेश मेहान को भी संगम का तट अब भी लुभाता है। उन्होंने बताया कि वह दोस्तों के साथ हर सप्ताह संगम जाया करते थे और वहीं भविष्य की योजनाएं बनतीं। उन्हाेंने कहा कि सभी योजनाएं तो नहीं पूरी हुईं लेकिन बहुत कुछ हासिल हुआ है। उन्होंने बताया कि 25 साल तक उन्होंने नौकरी की लेकिन इंजीनियरिंग कंसल्टेंसी कंपनी की शुरुआत कर निजी कार्य के क्षेत्र में कदम रखा। इसके बाद कई कंपनियाें की नींव रखी जो अब भी उनके सपनों और देश के विकास में योगदान दे रही हैं। कहा कि उन्होंने देश और समाज से बहुत कुछ हासिल किया है। साथ में दिया भी बहुत कुछ। बताया कि 46 साल बाद यहां आना हुआ और इस मौके पर वह हर पुरानी यादों को समेट लेना चाहते हैं।

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