‘देवता’ बनते ही भूल जाता है दर्द

Allahabad Updated Sun, 21 Oct 2012 12:00 PM IST
इलाहाबाद। रामदल और चौकियों पर आकर्षक वेशभूषा में ‘देवता’ बनकर बैठने या फिर रावण और काली की भूमिकाएं निभाने वालों को देखकर भले ही आपको अच्छा लगता हो, पर ‘देवता’ बनने के पीछे उनका दर्द भी छिपा होता है। कई किलो चांदी से बना रत्न जड़ित मुकुट तथा आभूषण और फूलों की माला पहने कई घंटों मंच पर बैठे रहना उनके लिए मुश्किल जरूर है, पर देवता बनने का आकर्षण उनके दर्द को कम कर देता है।
यह प्रक्रिया भी आसान नहीं। दिन में तकरीबन तीन बजे से पांच घंटे का शृंगार और फिर आधी रात या भोर तक हाथी के हौदे या रथ पर बैठना होता है। रावण दस मुकुटों को धारण करके चलता है। वहीं काली पात्र को एक हाथ में खप्पर, दूसरे में भुजाली लेकर चलना होता है, सिर पर 18 किलो का मुकुट तो होता ही है। हालांकि ये कलाकार देव आकर्षण और दर्द दोनों को स्वीकार करते हैं। काली पात्र रामू शुक्ला कहते हैं, काली बनना बहुत मुश्किल है, इसके लिए कई महीनों का कड़ा अभ्यास जरूरी है। वहीं कटरा में राम की भूमिका निभाने वाले कर्नलगंज के पवन कुमार पाठक ‘दीपक’ और सीता बनी गोलू को देवता बनना अच्छा लगता है।
भारद्वाज आश्रम परिसर में कटरा रामलीला कमेटी के पात्रों के शृंगार संयोजक हेमेंद्र नाथ गोस्वामी मानते हैं कि भारी भरकम पोशाक, फूल, शृंगार पहनकर बैठना भले मुश्किल हो पर मुकुट पहनते और पूजन होते ही उनके मन में देवता बनने का एहसास आ जाता है और यह ‘देवत्व’ ही उन्हें घंटों सजकर चौकी पर बैठने की शक्ति देता है। वहीं पजावा के शृंगार संयोजक चिंतामणि पांडेय के मुताबिक देवता बनने का आकर्षण ही उन्हें सहनशील बना देता है।
ऐसे होता है शृंगार
मशहूर सज्जाकार शैलेंद्र गोस्वामी के मुताबिक क्रीम, पाउडर, गोंद, रोली, सलमा, सितारा, पन्नी के साथ ही शृंगार में कई तरह की चीजें इस्तेमाल की जाती हैं। अब खड़िया मिट्टी का प्रयोग नहीं होता। सजाने के लिए रंगों के रेडीमेड ट्यूब बाजार में हैं जो त्वचा को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। इनसे चेहरा चमकदार और कांतिमय बना रहता है, बाद में आसानी से धुल दिया जाता है।

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