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कड़े अभ्यास के बाद बनते हैं ‘काली’

Allahabad Updated Fri, 12 Oct 2012 12:00 PM IST
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इलाहाबाद। चंद रोज बाद ही दारागंज में काली की सवारी की धूम होगी, सो काली का स्वांग करने वाले रामकृष्ण शुक्ल ‘रामू’ ने खुद को और अनुशासित कर लिया है। हालांकि उन्हें इस भूमिका के लिए जिम्मेदारी पिछले दिनों ही सौंपी गई लेकिन इसकी तैयारी छह महीने पहले से अभ्यास आरंभ कर दिया था।
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बकौल रामू, काली की भूमिका मिलने से सभी मान तो करते हैं लेकिन इसके लिए काफी परिश्रम करना पड़ता है। सुबह तकरीबन दस किलोमीटर की सैर के बाद जिम में दंड-बैठक के बाद चना, बादाम और पोस्ता के साथ एक लीटर दूध लेते हैं। थोड़ी देर बाद आधे घंटे तक बदन पर नाई से तेल की मालिश कराते हैं। फिर नहाना और काली जी की पूजा में वक्त बीतता है। दोपहर में थोड़ा आराम के बाद शाम को काली की भूमिका के अभ्यास से पहले ‘पैतरा’ के लिए भी तकरीबन घंटे भर से ज्यादा का अभ्यास होता है।

शाम को भी खाने का यही क्रम रहता है। कुल मिलाकर दो लीटर से ज्यादा दूध, सौ ग्राम बादाम, पोस्ता और पाव भर भीगा हुआ चना तो होता ही है, खाने में सुबह शाम दाल और बीस रोटियां भी लेते हैं। खाने के बाद फलों का सेवन भी करते हैं। इन दिनों चावल से परहेज करते हैं। कोशिश होती है कि फिटनेस और ऊर्जा बनी रहे। दारागंज में दोहरा और जनरल मर्चेंट की दुकान करने वाले रामू कहते हैं, इस दौरान दुकान से भी दूर रहता हूं, वहां की जिम्मेदारियां छोटे भाई निभाते हैं। बस, काली बनने से पहले मां काली का आशीर्वाद लेता हूं क्योंकि यह नाटक में अभिनय करने जैसा नहीं, एक देवरूप को धारण करना होता है। ऐसे में काली के रौद्र रूप का भार उठाना अलग अनुभव होता है, जिसे काली ही पूरा करती हैं। काली बनने में संतोष मिलता है, दो वर्षों बाद मुझे दोबारा यह भूमिका दी गई है।
बाबा, पिता, चाचा भी बन चुके हैं ‘काली’
काली का पात्र बनने का दायित्व गंगापुत्र घाटियों के पास ही है। तीन पीढ़ियों पहले से ही रामू के परिवार के सदस्य यह जिम्मेदारी निभाते आ रहे हैं। इससे पहले चाचा महेंद्र शुक्ला, विजय शुक्ला, पिता अनिल शुक्ला, बाबा राघेश्याम शुक्ला और उससे पहले पिता के नाना भी यह भूमिका निभा चुके हैं।
क्रमवार भारी होता जाएगा चेहरा
चांदी, पीतल और लोहे से बना काली का चेहरा तीनों दिन क्रमवार भारी होता जाएगा। पहले दिन की भूमिका में सात किलो के चेहरे के साथ सवारी निकलती है। दूसरे दिन दस और तीसरे दिन धारण करने वाला चेहरा पंद्रह किलो का होता है। इसके अतिरिक्त तकरीबन पांच किलो तक फूल मालाएं भी चेहरे को भारी करती हैं।
दशहरा उत्सव की शान है काली सवारी
यदि हनुमान दल, दारागंज के दशहरा उत्सव की पहचान है तो काली स्वांग शान। इसके बिना यह अधूरा ही कहा जाएगा। इसके तहत तीन दिनों तक माधो पहलवान के घर से काली प्राकट्य की लीला आरंभ होकर बक्शी तिनमुहानी पर जाकर पूरी होगी।

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