दशरथ से जिद नहीं, अदालत में जिरह

Allahabad Updated Sun, 07 Oct 2012 12:00 PM IST
इलाहाबाद। जिस कौशल्या ने अपने कलेजे के टुकड़े राम को चौदह वर्ष का वनवास न दिए जाने के लिए, राजा दशरथ से हठपूर्वक जिद नहीं की, उनके सामने अपनी जुबां पर ताले लगा लिए, उसी कौशल्या की भूमिका निभाने वाली ऋतंधरा मिश्रा अदालत में अपने मुवक्किलों के मुद्दों को पुरजोर तरीके से रखती, जिरह करती हैं।
पथरचट्टी रामलीला की ‘कथा रामराज की’ में बीते एक दशक से ज्यादा समय से बतौर कौशल्या भले ही वह कैकेयी को न मना सकी हों, वही ऋतंधरा परिवार परामर्श केंद्र में अब तक शहरी और ग्रामीण क्षेत्र के ढाई हजार से ज्यादा परिवारों के आपसी विवादों को बातचीत के जरिये सुलझाते हुए उन्हें दोबारा मिला चुकी हैं।
थिएटर से जुड़ीं ऋतंधरा कहती हैं, शुरुआत में कई वर्ष तक बतौर आर्टिस्ट ही कौशल्या का किरदार निभाती रही, पर अब तो ऐसा जुड़ाव हो गया है कि चित्रकूट प्रसंग या राम के वन गमन प्रसंग में सचमुच आंखें छलछला आती हैं। वैसे तो पूरी रामकथा ही अद्भुत है, पर ठुमुक चलत रामचंद्र प्रसंग में आनंद आता है। रामकथा ने ऐसा परिवर्तन किया है कि लोगों की ज्यादा से ज्यादा मदद करना अच्छा लगता है। छुट्टी के दिनों में किसी मलिन बस्ती में जाकर साथी वकीलों के साथ वंचित लोगों के बीच मुफ्त कानूनी सलाह देती हूं।
‘अमर उजाला’ से मुलाकात में ऋतंधरा ने रियल लाइफ का ब्योरा भी दिया। बोलीं, तमाम व्यस्तताओं के बीच मैं घर को भी तरजीह देती हूं। अदालत के लिए जरूरी फाइलें पलटने के बीच खाना बनाती रहती हूं। आलू के पराठे खाना और खिलाना अच्छा लगता है। फुरसत में घूमने-फिरने, गपशप से समय बचा तो पुरानी फिल्में, पुराने गाने सुनना नहीं भूलती। इसमें भी मीनाकुमारी और मनोज कुमार की फिल्में, गीत पसंदीदा हैं। अब बैडमिंटन के लिए वक्त नहीं मिलता, पर कभी स्टेट लेवल की चैंपियन भी रही। अभिनय सहित कई नाटकों के लिए निर्देशन भी किया। पत्र-पत्रिकाओं के लिए लिखने-पढ़ने का शौक तो शुरुआत से ही रहा। इस दौरान तो अदालत, रिहर्सल और स्क्रिप्ट याद करने में ही पूरा दिन गुजर जाता है, बाकी जरूरी काम अब दशहरा के बाद ही।

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