एक किलो चावल में 700 ग्राम ही निकलता है ठीक

Allahabad Updated Mon, 24 Sep 2012 12:00 PM IST
जारी। बढ़ती महंगाई ने मिड डे मील योजना पर कई तरह से चोट की है। दर्जनों प्रधानाध्यापकों और ग्राम प्रधानों ने स्कूलों में बच्चों के लिए दोपहर का भोजन बनवाने से हाथ खड़े कर दिए हैं। उनका कहना है कि केवल चावल और गेहूं कोटे की दुकान से मिलता है, बाकी सभी सामान कनवर्जन कास्ट से मंगाना पड़ता है। महंगाई बढ़ने का सीधा नुकसान यह है कि तेल, मसाला, दाल की कीमतों में बढ़ोत्तरी हो गई। इसके अलावा अब जब छह से अधिक रसोई गैस पर सब्सिडी नहीं मिलेगी तो बजट अपने आप दोगुना हो जाएगा। प्रति छात्र मिड डे मील के लिए मात्र तीन रुपये 11 पैसे में पहले ही नियमित मानक के अनुरूप भोजन दे पाना संभव नहीं था, और अब सभी वस्तुओं की कीमतें बढ़ने से भोजन बनाना संभव नहीं रह गया है।
दस-बीस नहीं सैकड़ों स्कूलों से शिकायत है कि मिड डे मील के लिए कोटे से जो गेहूं, चावल मिलता है, वह घटिया होता है। दाइयों ने डीएम, कमिश्नर से लिखित शिकायत की है कि कोटे से जो अनाज मिलता है, वह सीधे तौर पर बच्चों के खाने लायक नहीं होता। दाइयां मेहनत करती हैं तब एक किलोग्राम में से मात्र 700 ग्राम अनाज निकलता है। बाकी बेहद खराब, गंदा होता है। अक्सर कंकड़, गिट्टी के टुकड़े मिलते हैं। कागजों में तो एक किलो दर्ज हो जाता है लेकिन पकते समय मात्रा 700 ग्राम होती है। जाहिर है बच्चों को कम मिलेगा। दाइयों ने साफ लिखा है कि सब्जी में आलू, टमाटर केवल देखने भर को होते हैं। दाम इतने बढ़ गए हैं कि उसमें सब्जी देना संभव नहीं है।
नहीं मिल रहा सिलेंडर, लकड़ी भी महंगी
गैस सिलेण्डर की बढ़ती मारामारी ने बच्चों के दोपहर भोजन पर और संकट खड़ा कर दिया है। जसरा, कौंधियारा, करछना, जसरा, शंकरगढ़, लेड़ियारी, बड़ोखर के कई गांवों में रसोई गैस नहीं मिल पाती। वहां स्कूलों में लकड़ी पर ही भोजन पक रहा है। बारिश के कारण इन दिनों लकड़ी की कीमतें 550 रुपये क्विंटल तक पहुंच गए हैं जिससे खाना बनाना और मुश्किल हो गया है। भिस्कुरी, खूझी, जारी, गड़ैया खुर्द, मझियारी कला, लोटाढ़, गौहानी, नारीबारी, अंतरसुईया, खीरी, खपटिहा, बड़हा, मैदा आदि गांव के प्रधानों ने साफ तौर पर कहा है कि जो कनवर्जन कास्ट मिल रही, उसमें बच्चों को समुचित भोजन देना संभव नहीं है।
ग्राम प्रधानों ने विद्यालय कर्मियों और पंचायत सदस्यों के साथ मिल कर मिड डे मील में प्रति बच्चे पर खर्च का हिसाब कराया। ग्राम पंचायत जारी के प्रधान बिहारी लाल जायसवाल, भिस्कुरी की अनीता देवी कुशवाहा, गड़ैया खुर्द के रंजीत मोदनवाल, मझियारी कला के लल्लू आदिवासी, लोटाढ़ सूर्य प्रताप यादव, शंकर लाल पाल खूझी, राजू सिंह गौहानी, खीरी के रमाकान्त द्विवेदी, राघवेन्द्र शुक्ल नारीबारी ने बताया कि बच्चों का मन न होने के बाद भी बजट के मुताबिक कुछ भी बना दिया जाता है। मसलन किसी दिन बच्चों ने कढ़ी चावल बनाने की इच्छा जताई लेकिन बजट न होने से केवल खिचड़ी बनी। बच्चों ने आलू छोड़ कोई सब्जी नहीं देखी। ग्राम प्रधानों ने स्कूल में जब बजट बनाया तो माथा थाम लिया। भिस्कुरी के प्रधान राजेन्द्र कुमार कुशवाहा का कहना है कि न्यूनतम बजट तैयार कर देखा गया, एक बच्चे को मानक के मुताबिक भोजन दिया जाए तो किसी भी हाल में दस रुपये से कम नहीं लगेंगे लेकिन हैरानी है कि केवल तीन रुपये 11 पैसे मिल रहे हैं और उसी में अच्छा भोजन देने का दबाव है।
खाद्य सामग्री का स्थानीय रेट (जारी, जसरा, घूरपुर, नाराबारी बाजार में)
लकड़ी - 500 रुपए प्रति क्विंटल
मसाला - आठ सौ रुपए प्रति किलो
सरसो तेल- 100 रुपए प्रति किलो
गैस सिलेण्डर - 410 रुपए प्रति
आलू - 15 रुपए प्रति किलो
टमाटर - 20 रुपए प्रति किलो
बैगन - 20 रुपए प्रति किलो
दाल - 80 रुपए प्रति किलो
चीनी - 40 रुपए प्रति किलो
दूध - 25 रुपए प्रति किलो
आटा पिसाई - 150 रुपए प्रति क्विंतल

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