पच्चीस साल से फंसे शहरियों के 25 अरब

Allahabad Updated Mon, 24 Sep 2012 12:00 PM IST
इलाहाबाद। मकान की रजिस्ट्री है। हाउस टैक्स, वाटर टैक्स और सीवर टैक्स भी देते हैं। इन्हें टेलीफोन और बिजली कनेक्शन भी दिया गया है इसके बावजूद राजकीय आस्थान की जमीन (स्टेट लैंड) पर बसी लाखों की आबादी 25 साल से अवैध कब्जेदार कही जा रही है। लोगों को दिन-रात यह डर सताता रहता है कि प्रशासन बुल्डोजर चलवाकर कहीं उन्हें बेघर न कर दे।
हर चुनाव से पहले लोगों को आश्वासन मिलता है कि जल्द ही राजकीय आस्थान की फ्रीहोल्ड नीति लागू कर दी जाएगी और सरकार जमीन पर अपना दावा छोड़ देगी लेकिन चुनाव के बाद सभी वादे रद्दी की टोकरी में चले जाते हैं। प्रदेश के 45 जिलों में स्टेट लैंड हैं लेकिन सबसे ज्यादा जमीन इलाहाबाद में है। भूमाफिया ने लोगों को फर्जी कागज दिखाकर सरकारी जमीन ऊंची कीमतों में बेच दी। लोगों ने जब जीवन भर की कमाई से अपना घर बनवाया तो वहां प्रशासन के लोग बुल्डोजर लेकर पहुंच गए। बीच-बीच में अक्सर प्रशासन अभियान चलाकर तोड़फोड़ करता रहता है। प्रशासनिक दस्तावेजों में वहां बसे लोग अवैध कब्जेदार हैं जबकि नगर निगम ने वहां सड़कें सड़कें बना रखी हैं, बिजली और टेलीफोन विभाग ने कनेक्शन दे रखे हैं। शहर में राजकीय आस्थान की जमीन पर 50 हजार से ज्यादा मकान बने हुए हैं। अगर एक मकान की औसत कीमत न्यूनतम पांच लाख रुपए मान ली जाए तो 50 हजार मकानों के हिसाब से कुल 25 अरब की संपत्ति विवाद में फंसी हुई है। हालांकि मौजूदा सर्किल रेट के हिसाब से सपंत्ति की कीमत अब इससे कहीं ज्यादा हो चुकी है।

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