अमर सिंह के खिलाफ नहीं मिला सबूत: प्रवर्तन निदेशालय

Allahabad Updated Sat, 22 Sep 2012 12:00 PM IST
इलाहाबाद। राज्य सभा सांसद अमर सिंह के खिलाफ मनीलॉड्रिंग के आरोपों की जांच कर रहे प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को उनके खिलाफ कोई साक्ष्य नहीं मिला है। अमर सिंह की याचिका पर सुनवाई कर रही पूर्णपीठ के समक्ष शुक्रवार को निदेशालय के अधिवक्ता ने यह तथ्य रखा। निदेशालय की ओर से कोर्ट में अब तक की गई जांच से संबंधित तमाम दस्तावेज पेश किए गए। कहा गया कि अब तक कि जांच से उत्तर प्रदेश विकास परिषद के पूर्व अध्यक्ष के खिलाफ अनुचित तरीके से धन कमाने और अपनी कंपनियों को ठेका देकर लाभ पहुंचाने का कोई साक्ष्य नहीं मिला है। याचिका पर कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश अमिताव लाला, न्यायमूर्ति एके गुप्ता और पीकेएस बघेल की खंडपीठ सुनवाई कर रही है।
प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉड्रिंग एक्ट के प्रावधानों का हवाला देते हुए निदेशालय के अधिवक्ता ने कहा कि प्रावधानों से स्पष्ट है कि कोई अपराध होना चाहिए और उस अपराध के फलस्वरूप धन अर्जित किया गया हो। ऐसा कारण लिखित तौर पर स्पष्ट होने के बाद ही निदेशालय को मनीलॉड्रिंग से संबंधित जांच करने का अधिकार है। जहां तक भ्रष्टाचार और अन्य अपराधों की जांच का प्रश्न है, उसे किसी अन्य सक्षम एजेंसी से कराया जाना चाहिए।
अमर सिंह के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि निदेशालय की रिपोर्ट से स्पष्ट है कि याची के खिलाफ प्रथम दृष्टया कोई साक्ष्य नहीं है। उनके खिलाफ दर्ज प्राथमिकी में भी सरसरी तौर पर आरोप लगाए गए हैं। क्या भ्रष्टाचार किया गया इसका उल्लेख नहीं है। उन्होंने उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा की गई विवेचना का हवाला देकर कहा कि जांच अधिकारी ने अपने पर्चों में इस बात का जिक्र किया है कि उसने प्रदेश के तमाम विभागों से पांच करोड़ और अधिक ठेकोें के बारे में जानकारी मांगी थी। ज्यादातर विभागों ने जवाब दिया है कि ऐसा कोई ठेका नहीं दिया गया। शिकायतकर्ता भी अपने बयान में कोई तथ्यात्मक साक्ष्य नहीं दे सका। स्थिति यह है कि संदेह करने तक के लिए साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। याचिका पर 12 अक्टूबर को अगली सुनवाई होगी।
उल्लेखनीय है कि कानपुर के शिवाकांत त्रिपाठी ने बाबूपुरवा थाने में अमर सिंह के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई है। आरोप है कि उन्होंने उत्तर प्रदेश विकास परिषद का अध्यक्ष रहते हुए अवैध तरीके से करोड़ों रुपए अर्जित किए। खुद की कंपनियों को अनुचित लाभ पहुंचाया। हाईकोर्ट ने 20 मई 2011 को इस मामले की जांच प्रवर्तन निदेशालय को सौंप दी थी। निदेशालय ने संशोधन प्रार्थनापत्र देकर जांच करने का आदेश बदलने की मांग की है।

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