थाली में दाल-रोटी नहीं, मोबाइल और टीवी

Allahabad Updated Sun, 26 Aug 2012 12:00 PM IST
ख़बर सुनें
खाद्य वस्तुओं के बजाय इलेक्ट्रानिक उपकरणों के भाव से तय हो रहा महंगाई भत्ता
65 से घटकर केवल 45 फीसदी रह गया खाद्य वस्तुओं का हिस्सा
अमित सरन
इलाहाबाद, 25 अगस्त। सरकार की नजर में कर्मचारियों और उनके परिजनों का पेट दाल-रोटी से नहीं बल्कि मोबाइल, टीवी, फ्रिज और तमाम इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से भरता है। कम से कम महंगाई भत्ते (डीए) के नाम पर मिलने वाली रकम में जिस तरह का बदलाव दिख रहा, उससे यही पता चलता है। दरअसल मंहगाई दर उपभोक्ता मूल्य सूचकांक से तय होता है। पहले यह सूचकांक तय करने के लिए खाद्य वस्तुओं का रेट लिया जाता था, लेकिन अब टीवी, फ्रिज, मोबाइल, फोन की कॉल रेट सहित तमाम ऐसी चीजें शामिल कर ली गई हैं, जिनका मूल्य बढ़ने के बजाय कम हो रहा है जबकि खाद्य महंगाई तेजी से आसमान छू रही है। नतीजा है कि महंगाई भत्ता आनुपातिक तौर पर बढ़ने के बजाय कम हो गया।
खाद्य महंगाई 175 फीसदी, मिलता है 65 फीसदी डीए
भले ही हर छह माह में केंद्रीय एवं राज्य कर्मचारियों के मूल वेतन में बढ़ोतरी की जा रही हो लेकिन डीए गणना के फार्मूले में खामियों के कारण यह बढ़ोतरी नाकाफी है। खाद्य महंगाई 175 फीसदी तक पहुंच गई है लेकिन कर्मचारियों को वर्तमान में महज 65 फीसदी डीए मिल रहा है। पुरानी व्यवस्था ही बहाल कर दी जाए तो कर्मचारियों को कम से कम 100 फीसदी डीए मिलने लगे।
मूल्य सूचकांक तय करने का आधार बदला
दरअसल, डीए की गणना उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के आधार पर होती है। पहले उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में खाद्य वस्तुओं का हिस्सा 65 फीसदी था, जो अब 45 फीसदी रह गया है। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के आधार पर ही निर्धारित फार्मूले में उसकी गणना कर डीए का निर्धारण होता है। अब इस सूचकांक में इलेक्ट्रानिक उपकरणों के जुड़ने से परेशानी हो गई है। सूचकांक से ऐसी तमाम इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएं हटा दी जाएं, जिनकी कीमत स्थिर है या कम हो रही है और उनकी जगह खाद्य वस्तुओं की हिस्सेदारी बढ़ा दी जाए तो वर्तमान में कर्मचारियों को न्यूनतम 100 फीसदी डीए का लाभ मिलने लगे। खाद्य वस्तुओं कि हिस्सेदारी 45 से बढ़ाकर पहले की तरह 65 फीसदी कर दी जाए तो भी मूल वेतन में कम से कम 20 फीसदी की बढ़ोतरी हो जाए और कर्मचारियों को महंगाई से कुछ हद तक राहत मिल जाए।
थोक और फुटकर में कम अंतर भी मुसीबत
0 खाद्य वस्तुओं का उपभोक्ता मूल्य सूचकांक तय करते वक्त सरकार ने मान लिया कि फुटकर में बिकने वाली वस्तुओं की कीमत थोक कीमत से 20 फीसदी ज्यादा है जबकि आमतौर पर थोक और फुटकर कीमतों में 30 से 50 फीसदी तक का अंतर होता है। उदाहरण के तौर पर थोक बाजार की किसी वस्तु की कीमत 100 रुपए है तो सरकार के हिसाब से उसकी फुटकर कीमत 120 रुपए होनी चाहिए जबकि कर्मचारियों का कहना है कि वही वस्तु फुटकर बाजार में आने के बाद 130 से 150 रुपए में मिल रही है। ऐसे में सरकार ने महंगाई का जो आंकलन लगाया, वह सरासर गलत है।
हर पांच साल में वेतन आयोग के गठन की मांग
0 कर्मचारी लगातार मांग कर रहे हैं कि वेतन का पुनरीक्षण हर पांच साल में किया जाए। इसके लिए वे सातवें वेतन आयोग के गठन की मांग भी कर रहे हैं। महंगाई से त्रस्त कर्मचारियों ने इस साल 12 दिसंबर को कनफेडरेशन ऑफ सेंट्रल गवर्नमेंट इम्पलाइज ऐंड वर्कर्स के बैनर तले एक दिनी राष्ट्रीय हड़ताल भी घोषित कर रखी है।
----------------------------
‘सरकार ने सभी नियम सिर्फ अपने फायदे के लिए बना रखे हैं। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के निर्धारण में इतनी बारीकी से हेरफेर किया गया है कि वह आसानी से पकड़ में नहीं आ सकता लेकिन इसकी आड़ में सरकार कर्मचारियों के हिस्से की कमाई पर अपना कब्जा जमाती जा रही है और कर्मचारी महंगाई से परेशान हैं।’
हरिशंकर तिवारी
विशिष्ट आमंत्रित सदस्य, आल इंडिया ऑडिट ऐंड एकाउंट एसोसिएशन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

Spotlight

Most Read

Chandigarh

अपने ही दो भाइयों, दो बहनों समेत 7 लोगों को मारने वाली पर नहीं कर सकते रहम: हाईकोर्ट

अपने ही दो भाइयों, दो बहनों और दादी समेत सात लोगों की हत्या करने वाली पर रहम नहीं किया जा सकता। उसकी और उसके प्रेमी की मौत की सजा बरकरार रहेगी।

18 जुलाई 2018

Related Videos

किराया नहीं चुकाने पर कांग्रेस के सबसे पुराने दफ्तर का वजूद खतरे में, क्या करेंगे राहुल गांधी?

देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस के सबसे पुराने राजनीतिक दफ्तर का वजूद खतरे में हैं। इसकी वजह कुछ और नहीं बल्कि पिछले बयालीस सालों से दफ्तर का किराया नहीं देना है। वहीं अब दफ्तर बचाने के लिए पदाधिकारी और कार्यकर्ता चंदा जुटा रहे हैं।

20 जुलाई 2018

Recommended

आज का मुद्दा
View more polls

Disclaimer

अपनी वेबसाइट पर हम डाटा संग्रह टूल्स, जैसे की कुकीज के माध्यम से आपकी जानकारी एकत्र करते हैं ताकि आपको बेहतर अनुभव प्रदान कर सकें, वेबसाइट के ट्रैफिक का विश्लेषण कर सकें, कॉन्टेंट व्यक्तिगत तरीके से पेश कर सकें और हमारे पार्टनर्स, जैसे की Google, और सोशल मीडिया साइट्स, जैसे की Facebook, के साथ लक्षित विज्ञापन पेश करने के लिए उपयोग कर सकें। साथ ही, अगर आप साइन-अप करते हैं, तो हम आपका ईमेल पता, फोन नंबर और अन्य विवरण पूरी तरह सुरक्षित तरीके से स्टोर करते हैं। आप कुकीज नीति पृष्ठ से अपनी कुकीज हटा सकते है और रजिस्टर्ड यूजर अपने प्रोफाइल पेज से अपना व्यक्तिगत डाटा हटा या एक्सपोर्ट कर सकते हैं। हमारी Cookies Policy, Privacy Policy और Terms & Conditions के बारे में पढ़ें और अपनी सहमति देने के लिए Agree पर क्लिक करें।

Agree

अमर उजाला ऐप चुनें

सबसे तेज अनुभव के लिए

क्लिक करें Add to Home Screen