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‘ईश्वरीय कण’ की मुहिम में कुंभ नगरी भी

Allahabad Updated Fri, 06 Jul 2012 12:00 PM IST
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शोध के लिए डाटा बेस तैयार करने में एचआरआई की अहम भूमिका
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जेनेवा में हुए महाप्रयोग के लिए इलाहाबाद की निशिता ने दिए कई कम्प्यूटर कोड
प्रयोग से दस साल से जुड़े हैं प्रो. मुखोपध्याय और उनके साथी
वैज्ञानिकों को उम्मीद, अगले पांच साल में निकलेंगे ब्रह्माण्ड के कई अद्भूत रहस्य
इलाहाबाद। दुनिया भर के वैज्ञानिक जिस ‘ईश्वरीय कण’ की खोज में लगे हैं उस प्रयोग में संगम नगरी की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। हरीश्चंद्र शोध संस्थान के वैज्ञानिकों ने जेनेवा में हो रहे इस महाप्रयोग में डाटा बेस तैयार किया है। संस्थान की यह भूमिका आगे भी जारी रहेगी। संस्थान के कई छात्रों ने इससे भी आगे बढ़कर कम्प्यूटर कोड तैयार करने के साथ भविष्य में होने वाले प्रयोग की संभावनाओं तथा इसके रिजल्ट का खाका भी बनाया है। इस प्रयोग की सफलता से उत्साहित संस्थान के वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि अगले पांच साल में ब्रह्माण्ड के कई अद्भूत रहस्य सामने होंगे।
संस्थान के प्रो.बिश्वरूप मुखोपध्याय के नेतृत्व में प्रो.वी. रविंदरन, प्रो.आशीष दत्ता और प्रो.एंड्रीस नेफलर के अलावा विद्यार्थी निशिता देसाई, सत्यनारायन मुखोपध्याय, संजय बिश्वास की टीम इस अभियान से 10 साल से जुड़ी हुई है। इस दौरान संस्थान के वैज्ञानिकों ने अलग-अलग स्तर पर न्यूट्रान और प्रोट्रान के बीच टकराव की संभावनाओं का अध्ययन किया। इससे आगे के शोध में काफी मदद मिली। इसके साथ ही वैज्ञानिकों ने टकराव के बाद मिलने वाले संकेतों का भी अध्ययन कर डाटा बेस तैयार किया है। इस पूरे अध्ययन में 2005 में खुले रीजनल सेंटर फॉर एक्सीलेटर बेस्ड पार्टिकल फिजिक्स से काफी मदद मिली। क्लस्टर कम्प्यूटर वाले सेंटर में इस तरह के अध्ययन की काफी क्षमता है। यूरोपियन सेंटर फार न्यूक्लियर रिसर्च (सर्न) से डाटा सीधे यहां आता है, जिसका तकरीबन 100 फीसदी शुद्धता तक अध्ययन किया जाता है।
प्रो.मुखोपध्याय का कहना है कि यह बहुत बड़ा प्रयोग हो रहा है। इसकी सफलता से पार्टिकल से संबंधित 1960 के सिद्धांत को और मजबूती मिली है। साथ में ही यह भी कहा कि जिस पार्टिकल की खोज की जा रही है वह अभी मिला नहीं है। संभावना जताई जा रही है कि वही पार्टिकल है। इसकी पुष्टि में अभी कई प्रयोग करने होंगे। बताया कि इस प्रयोग से सिर्फ बिग बैन के बाद कुछ मिनट की स्थिति को जानने में मदद मिलेगी। ब्र्रहाण्ड के बारे में जानने का सफर अभी काफी लंबा है।
उन्होंने बताया कि इस प्रयोग से फिजिक्स के क्षेत्र में नए सिद्धांतों के अध्ययन में काफी मदद मिलेगी। साथ में संचार, मैटेरियल साइंस आदि क्षेत्र में भी रिसर्च की संभावनाएं बढ़ेंगी। इस अभियान में संस्थान के योगदान से उत्साहित प्रो.मुखोपध्याय का कहना था कि निश्चित ही आगे भी उनकी महती भूमिका होगी। कहना था कि सर्न में जाना बहुत रोमांचित करता है। बताया कि इस अभियान में मुख्य भूमिका निभाने वाले वैज्ञानिक ब्रूश मेलौडो यहां अक्सर आया करते थे।
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निशिता ने तैयार किए कम्प्यूटर कोड
0 सत्यनारायण ने जापान के वैज्ञानिक की मदद से संभावनाओं की घोषणा
इलाहाबाद। ब्रहाण्ड के रहस्यों पर से पर्दा हटाने वाले कण की इस खोज में इलाहाबाद के युवा वैज्ञानिकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। हरीश्चंद्र शोध संस्थान के शोधार्थी न केवल इस अभियान से जुडे़ वैज्ञानिकों की टीम का हिस्सा बने बल्कि नई खोज के बल पर इस महाप्रयोग को दिशा भी दी।
छात्रा निशिता देसाई ने कई कम्प्यूटर कोड दिए, जिससे इस प्रयोग में काफी मदद मिली। इसे निशिता के साथ संस्थान के लिए भी बड़ी उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है। इसके लिए निशिता का लगातार जेनेवा आना-जाना रहा। एक अन्य छात्र सत्यनारायण मुखोपध्याय ने जापान के वैज्ञानिकों के साथ मिलकर प्रयोग से मिलने वाले सिग्नल का अध्ययन करके संभावनाओं की घोषणा की है। साथ में इसका एक प्रारूप भी तैयार किया है। संजय बिश्वास ने भी जापान और फ्रांस के वैज्ञानिकों के साथ मिलकर ब्र्रहाण्ड के कई रहस्यों से पर्दा उठाया है। इससे आगे के अध्ययन में काफी मदद मिलने की बात कही जा रही है।
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मीरापुर का ईशान भी ‘महाप्रयोग’ का हिस्सा
0 फंडामेंटल पार्टिकिल पर विशेष प्रोजेक्ट बनाने के लिए जेनेवा जाने का मिला था मौथा
इलाहाबाद। ईश्वरीय कण की खोज जब होगी तब होगी, ईशान के लिए यह मौका अजूबे से कम नहीं है। इंडियन स्कूल विजिट टू सर्न योजना के तहत पिछले साल अगस्त में कुछ मेधावी छात्र-छात्राओं को जेनेवा में इस महामशीन के गतिविधियों से परिचित कराने के लिए ले जाया गया था, जिसमें ईशान भी शामिल है।
मीरापुर में रहने वाला ईशान सिंह जायसवाल बनारस में जे. कृष्ण मूर्ति फाउंडेशन के राजघाट बेसेंट स्कूल का छात्र है। दसवीं का छात्र (अब ग्यारहवीं) ईशान इस महाप्रयोग के बारे में कुछ जानता भी नहीं था लेकिन एक दिन मैडम राका रे मंडल ने छात्र-छात्राओं के सामने यह चुनौती रख डाली। फंडामेंटल पार्टिकिल पर बेस्ट प्रोजेक्ट तैयार करने वाले को इस महामशीन को देखने का मौका मिलेगा। ईशान बताता है, वह फंडामेंटल पार्टिकिल के बारे में भी बहुत कुछ नहीं जानता था लेकिन भौतिकी में काफी रुचि थी। अध्ययन के साथ इसके बारे में जानने की इच्छा और बढ़ती गई। इस लगन का नतीजा रहा कि न केवल ईशान बल्कि बतौर गार्जियन पिता अमित जायसवाल को भी जेनेवा जाने का मौका मिला। टैगोर पब्लिक स्कूल में टीचर रश्मि जायसवाल का पुत्र ईशान बताता है, ‘उस मशीन को देखना काफी रोमांचकारी रहा। जीवन में बहुत बड़ा अवसर था।’ ईशान ने बताया कि वहां मशीन के बारे में जानने के साथ दुनिया भर के वैज्ञानिकों से मिलने का भी मौका मिला। बड़े सौभाग्य की बात है। उनसे प्रेरित ईशान भी एमएससी करके वैज्ञानिक बनना चाहता है। ईशान के पिता अमित कहते हैं, ‘अफकोस, बहुत बड़ा अवसर था। वह रोमांच पूरी उम्र साथ रहेगा।’ बेटे ने बहुत बड़ा अवसर उपलब्ध कराया। कभी सोचा भी नहीं था कि यह सब देखने को मिलेगा। मां रश्मि को भी बेटे से काफी उम्मीदें हैं।

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