बेसिक शिक्षा का बैठा भट्ठा

Aligarh Updated Mon, 15 Oct 2012 12:00 PM IST
सालाना सवा दो अरब रुपये के भारीभरकम बजट के बाद भी जनपद का एक भी
प्राइमरी या जूनियर हाईस्कूल आदर्श स्थिति में मिल जाये तो बहुत बड़ी गनीमत समझिए। साल दर साल बजट बढ़ने के साथ स्कूलों की दशा सुधरने की जगह बिगड़ती ही जा रही है। एक बच्चे की पढ़ाई पर सरकार एक साल में लगभग 8400 रुपये तक खर्च कर रही है लेकिन रिजल्ट बेहद घटिया स्तर का है। पेश है इन स्कूलों की हालत का जायजा लेती हमारे वरिष्ठ संवाददाता आशीष निगम और फोटोग्राफर महीपाल सिंह की रिपोर्ट-जिसे पढ़ कर आप खुद ही अंदाजा लगा सकते हैं कि इतने भारी खर्च के बाद पढ़ाई के नाम पर गरीब बच्चों के भविष्य के साथ कैसा मजाक हो रहा है।
सुबह 8.00 बजे
के स्कूल में 9.45 बजे अशरफपुर जलाल के शिक्षामित्र सचिन कुमार गायब थे और उनकी क्लास में बच्चों ने शोरगुल मचा रखा था। दूसरी शिक्षामित्र ज्योति भी आराम से कुर्सी पर जमीं हुई बच्चों को नसीहत दे रहीं थीं-चुप रहो। हैडमास्टर शारदा देवी कमर में चोट लगने के कारण बगल की कुर्सी पर थीं। कहीं पढ़ाई का नामोनिशान नहीं था। दूसरे शिक्षक रामपाल सिंह नहीं आये थे। स्कूल के 178 बच्चों में कितने हाजिर हैं यह भी किसी को नहीं मालूम था। बस मिड डे मील के इंतजार में बच्चे जैसे तैसे बैठे थे। यहां की गदंगी बच्चों की बेकद्री देख कर किसी भी आदमी को बेचैनी हो सकती है।
सुबह 11.00 बजे प्राथमिक विद्यालय शाहपुरकुतुब का मेन गेट पर ताला जड़ दिया गया था। बच्चे मिड-डे-मील की लाइन में लगे थे। रोस्टर के मुताबिक खीर बंटनी थी लेकिन दूध नहीं मिलने के कारण सब्जी चावल बांट दिया गया। प्रधानाध्यपक सुधा सिंह बोलीं- पहली बार ऐसा हुआ है। उनके अलावा यहां पर एक शिक्षामित्र फैजल शाहीना मौजूद थीं। 165 बच्चों वाले इस स्कूल में हाजिरी लग चुकी थी। क्लासरूम और दूसरी व्यवस्थाएं दुरुस्त थीं। यहां कक्षा पांच की राखी बमुश्किल केवल दो का पहाड़ा सुना सकी।
सुबह 11.30 बजे शाहपुरकुतुब के जूनियर हाईस्कूल में मिड-डे-मील बंट रहा था। लेकिन कक्षाओं में पढ़ाई का बेहतर माहौल यहां भी नहीं मिला। प्रधानाध्यापक अब्दुल हफीज अंसारी बोले कि इंटरवल चल रहा है। यहां 150 बच्चों में केवल 93 उपस्थित थे बाकी का पता नहीं था। यहां कक्षा आठ की लड़कियों को इंग्लिश में ‘ऐट’ लिखना नहीं पता था। कक्षा 6 की सुषमा ने 11 का पहाड़ा सुनाया- 11 दूनी 24 और 11 तीका 36..। गनीमत थी कि बच्चों को एबीसीडी रटा दी गई थी।

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