सरहदों का दर्द : आखिरी बार अब्बू का चेहरा न देख सके शरीफ

Aligarh Updated Sat, 04 Aug 2012 12:00 PM IST
अलीगढ़। अतरौली के छम्मे खां के पाकिस्तान में दम तोड़ने से दो दिन पहले ही उनके साथ गए अतरौली के ही शरीफ को भी सरहदों का ‘दर्द’ झेलना पड़ा। जिस समय छम्मे खां का इलाज चल रहा था उसी समय शरीफ को खबर मिली की हिन्दुस्तान में उनके पिता का इंतकाल हो गया है। इस खबर ने उन्हें हिलाकर रख दिया। तमाम लिखापढ़ी और जांच-पड़ताल में वह वहां इस कदर उलझाए गए कि शरीफ अपने पिता का चेहरा आखिरी बार नहीं देख सके। यहां पिता को सुपुर्द ए खाक कर दिया गया।
पाकिस्तान निवासी छम्मे खां की बहन सद्दन ने फोन पर बताया कि उनके भाई के साथ अतरौली के मुहल्ला खरीफान निवासी शरीफ भी वहां पहुुंचे थे। वहां पहुंचने के बाद से ही उनके भाई का इलाज चल रहा था। शरीफ के बेटे नदीम ने बताया कि उनके दादा 80 वर्षीय बुन्दू खां की तबियत अक्सर खराब रहती थी। पिता को इसकी जानकारी थी तो वह पाकिस्तान जाने के बाद भी फोन पर हालचाल ले रहे थे। 24 जुलाई को जब दादा का इंतकाल हुआ तो इसकी जानकारी उन्हें दी गई। लेकिन पिता का आना संभव नहीं था, इसलिए दादा को चाचा नसीर ने सुपुर्द ए खाक किया। गौर हो कि पाकिस्तान में आठ दिन पूर्व अतरौली निवासी छम्मे खां की मौत हो गई थी, जिन्हें वहां के प्रशासन ने दफनाने से इनकार कर दिया था। शुक्रवार को उनका शव नौवें दिन भारत लाया गया।
पुराने जमींदार थे छम्मे खां
अतरौली। अतरौली के मुहल्ला घोसीपाड़ा निवासी छम्मे खां पुराने जमींदार थे। उनके चचेरे भाई सलीम ने बताया कि पट्टी शेर सिंह में अब भी छम्मे खां की 32 बीघा जमीन है, जिसको उन्होंने पट्टे पर अपने ही रिश्तेदारों को दे रखा है। उनके दो बेटे फखरुज्जमा उर्फ गुड्डू और समरुज्जमा उर्फ राजू कानपुर की चमड़ा फैक्ट्री में नौकरी करते हैं। अपनी पत्नी मोमना बेगम के साथ वह यहां रहते थे। बैसपाड़ा में जूते की दुकान में भी पार्टनर थे। सलीम ने बताया कि छम्मे खां के छोटे भाई नूरुलहुदा रेलवे में नौकरी करते हैं। तीसरे भाई बदरुज्जमा खेती करते हैं। छम्मे खां का शव दिल्ली से लेने के लिए उनके छोटे भाई और भतीजा कुछ रिश्तेदारों के साथ गए हैं।
पाक की हरकत मुसलमानों की तौहीन
‘पाकिस्तान में ताया और चाचा रहते हैं। अक्सर फोन पर बात होती है। जैसे सऊदी अरब में हर साल भारत के सैकड़ों लोगों को दफनाया जाता है, इस तरह पाकिस्तान में दफनाने की इजाजत मिलनी चाहिए।’
- मो. ताहिर
‘वालिद साहब बंटवारे के बाद पाकिस्तान चले गए थे, तभी से कुछ रिश्तेदार रहते हैं। पाकिस्तान की हरकत पर स्थानीय लोगों में रोष है। इसका विरोध करते हुए पाक का पुतला फूंकने की योजना है।’
- हाजी जैनुद्दीन

‘देशों की पॉलिसी कुछ भी हो, इंसानियत के नाते वहां के कब्रिस्तान में हिंदुस्तानी को दफनाना चाहिए। वहां के लोग भी मुसलमान हैं और इस्लाम सभी मुसलमानों के लिए समान है।’
- मो. शाहिद
‘मेरे कई रिश्तेदार पाकिस्तान में रहते हैं,1986 को वहां गया था। वहां के लोगों में हिंदुस्तानियों के लिए गलत सोच है। हिंदुस्तानी मुसलमान को कमतर समझते हैं। पाक की यह हरकत मुसलमानों की तौहीन है।’
- अख्तर खान

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