इलाज देने को ली जमीन...देते रहे ‘जख्म’

Aligarh Updated Sat, 04 Aug 2012 12:00 PM IST
अलीगढ़। विकास कार्यों के लिए मानवता का वास्ता देकर किसानों से उनकी जमीन लेने के बाद उस किसान के साथ किस तरह पक्षपात होता है उसका जिंदा उदाहरण हैं गांव धौर्रा माफी के पूर्व प्रधान जय सिंह। एएमयू के जेएन मेडिकल कॉलेज के निर्माण को 1965 से 1970 के बीच 150 बीघा जमीन देने वाले जय सिंह के लिए मेडिकल कॉलेज में इलाज ही मयस्सर नहीं है। पिछले दिनों सीने में तकलीफ के बाद एंजियोग्राफी और एंजियोप्लास्टी के लिए जय सिंह को एम्स रेफर कर दिया गया। वहां पर हो रही देरी के चलते दिल्ली के कैलाश हॉस्पिटल में इलाज हुआ, जिसमें 6 लाख रुपये खर्च हुए। पैर में तकलीफ अब भी बरकरार है। जयसिंह कहते हैं कि 45 साल पहले उनके पिता गोधी सिंह भी थे। अस्पताल को जमीन देने में हमें हिचक हो रही थी। हमसे कहा गया कि यहां ऐसा हॉस्पिटल बनेगा जिसमें दुनिया का सब इलाज होगा। तुम्हारे बच्चे रिश्तेदारों आदि को भी बेहतर इलाज बेहद कम पैसों में मिलेगा। यह पुण्य का काम है। इसके बाद पुरखों से जोतते आ रहे जमीन के इस टुकडे़ को सीने पर पत्थर रखकर अलग कर दिया। आज अपनी उपेक्षा देखते हैं तो इस ‘जख्म’ की तकलीफ से कलेजा रोने को आता है। जो सपने उस समय दिखाए गए थे, उसकी पूरा होने की उम्मीद अपने जीवनकाल में संभव नहीं दिखती।
जयसिंह कहते हैं कि इसी मेडिकल कॉलेज में 8 साल पहले उनके दो बच्चों सतीश और मीरा को पर्चा बनने के बाद बिना इलाज किए ही बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था। तत्कालीन कुलपति से मामले की शिकायत की तो उस समय के कैजुअलिटी मेडिकल ऑफिसर के खिलाफ कार्रवाई भी हुई थी। जयसिंह के बच्चों को हॉस्पिटल वापस लाने के लिए कहा लेकिन तब तक वह निजी नर्सिंग होम में भर्ती करा चुके थे क्योंकि तकलीफ बहुत ज्यादा थी। धौर्रा माफी गांव के लालता, गोवर्धन आदि लोगों के परिवार ने भी जेएन मेडिकल कॉलेज के लिए जमीन दी थी, लेकिन अब यही लोग मेडिकल कॉलेज के लिए बेगाने हैं।
‘मेडिकल कॉलेज की फंडिंग बढ़वाने के लिए जो प्रयास आज हो रहे हैं, उतने कभी नहीं हुए। कुलपति ने अभी हाल ही में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री से मुलाकात की है। जल्द ही परिणाम दिखाई देने लगेंगे। इसके बाद न सिर्फ आधुनिक इलाज मिलेगा बल्कि सहजता के साथ मिलेगा’
प्रो.अशरफ मलिक, प्रिंसिपल जेएन मेडिकल कॉलेज
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