यह ‘ध्रुवीकरण’ किसके सिर बांधेगा ताज

Aligarh Updated Mon, 02 Jul 2012 12:00 PM IST
अलीगढ़। बेशक अपने महानगर के भावी प्रथम नागरिक के भविष्य का फैसला ईवीएम में कैद हो गया है। मगर इस ‘गरमी’ ने सबके पसीने छुड़ा दिए हैं। आंकड़ों को लेकर अटकलें हैं, मगर अंदरखाने सभी के ‘छक्के’ छूटे हुए हैं। बेशक शहर की परंपरा के अनुसार मुसलिम वोटों के ध्रुवीकरण से मुख्य लड़ाई में भाजपा और बसपा समर्थित प्रत्याशी का होना माना जा रहा है, मगर तस्वीर अभी धुंधली है। नए परिसीमन के हिसाब से हुए हालिया विधानसभा चुनाव में शहरी आबादी से दो-दो मुसलिम विधायकों के जीतने पर भाजपा को छोड़ सभी दलों ने मुसलिम वोटों पर डोरे डालने के इरादे से मुसलिम प्रत्याशी मैदान में उतारे। बसपा ने बिना सिंबल के रजिया खान को प्रत्याशी बनाया। कांग्रेस ने भी शबाना खातून पर दांव खेला। सपा ने चुनाव से खुद को बेशक पीछे खींच लिया, लेकिन पार्टी के चार-चार मुसलिम प्रत्याशी मैदान में आ गए। साढ़े पांच लाख की मतदाता संख्या वाले नगर निगम में करीब ढाई लाख मुसलिम वोटों पर छह मुसलिम प्रत्याशी होने पर सभी इस बात को लेकर आश्वस्त थे कि किसी एक के पक्ष में ध्रुवीकरण होगा। इसे लेकर सपा के चार में से किसी एक को मैदान में रखने के प्रयास हुए। मगर सफलता नहीं मिली। अंत में मतदान के दिन ध्रुवीकरण बसपा समर्थित प्रत्याशी के समर्थन में दिखाई दिया। इसके पीछे तर्क दिया गया कि उन्हें बसपा का दलित वोट तो मिलेगा ही। मगर ध्रुवीकरण के बाद भी मुसलिम वोट बंटने की बात से इंकार नहीं किया जा सकता। बात अगर सपा की करें तो एकजुटता के अभाव में सपा का वोटर तय नहीं कर सका कि किसके पक्ष में जाना है। कांग्रेस प्रत्याशी की स्थिति कुछ ऐसी रही कि अपनों की मदद नहीं मिली। भाजपा को उम्मीद थी कि इकलौती सशक्त हिंदू प्रत्याशी होने के कारण जीत तय है, लेकिन मतदान प्रतिशत कम होने के कारण भाजपा के भी पसीने छूटे हुए हैं। हां, इतना जरूर है कि निकाय चुनाव में लगातार कम होते मतदान प्रतिशत ने इस बात का अहसास जरूर करा दिया है कि बदहाल महानगर की हालत देख पब्लिक सिस्टम से खफा है। रहा सवाल जीत का तो यह 7 जुलाई को तय होगा कि सेहरा किसके सिर बंधेगा।

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