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ये जिस्म क्या है कोई पैहरन उधार का...

Agra Updated Mon, 25 Feb 2013 05:30 AM IST
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आगरा। ‘अगर सफर में मेरे साथ मेरा प्यार चले, तवाफ करता हुआ मौसम बहार चले, ये जिस्म क्या है कोई पैरहन उधार की, यहीं संभाल कर पहना, यही उतार चले’। शायर आलोक श्रीवास्तव के इस शेर पर मुकर्रर की आवाजों के बीच अदबी शायरी ने जब अपना मुकाम पाया तो महफिल महक उठी। मौका था, ताज महोत्सव के अंतर्गत सूरसदन में आयोजित मीर-ओ-गालिब कुल हिंद मुशायरे का। देश के नामी-गिरामी शायरों ने अपने शेर और गजलों से ऐसा समां बांधा कि मुशायरे की शमा ने सूरसदन के जर्रे जर्रे को रोशन कर दिया।
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‘तुम्हारा चेहरा चरागों में कौन रखता है...से मुशायरे की पहली गजल पेश की। जौहर कानपुरी ने ‘कोई मजहब नहीं कहता सितम... से फिरकापरस्तों पर निशाना साधा। इकबाल अशर ने ‘न जाने कितने चिरागों को मिल गई शोहरत...से अवसरवादिता का अक्स दिखाया। वहीं शकील आजमी ने ’परों को खोल जमाना उड़ान देखता है...और अकील नोमानी ने ‘सोचते हैं सब जरूरी है बगावत... से रवानी भरी। मदन मोहन दानिश के शेर ‘मसअला ये इश्क का है जिंदगी का नहीं...से महफिल परवान पर जा पहुंची। मुंबई के शायर राजेश रेड्डी ने इस दौरान ‘मैंने तो लिखा था दर, दीवार पढ़ा उसने... महफिल को ऊंचाई दी। अंत में वसीम बरेलवी ने अपनी नज्मों से महफिल को खुशगोई अंजाम तक पहुंचाया। ‘जरा सा कतरा कहां अगर उभरता है, समंदरों के ही लहजे में बात करता है...से उन्होंने महफिल की वाहवाही लूटी। निजामत कतरते हुए मंसूर उस्मानी ने ‘कोई हंस के, हंसा के टूट गया, कोई आंसू बहा के टूट गया... से गुफ्तगू के अंदाज में शायरी को दिलों से जोड़ते हुए कई सबक भी दिए। इसके अलावा फारुक इंजीनियर, रईस निजामी, अशोक साहिल ने भी समां बांधा।
इससे पहले मुशायरे की शमा मेहमाने खुशुसी सपा के राष्ट्रीय महासचिव रामजी लाल सुमन और मंडलायुक्त प्रदीप भटनागर ने रोशन की। संयोजक कैप्टन प्रभांशु श्रीवास्तव, समन्वयक केसी श्रीवास्तव, अमीर अहमद ने शायरों का स्वागत किया। प्रबंधन रावी इवेंट का रहा।

लेकिन टूटी कुर्सियां और दर्द किससे कहें
मुशायरे की महफिल के दौरान कुर्सी और बिजली का करंट लोगों को परेशान कर गए। फारुक इंजीनियर के नज्म पेश करने के दौरान सूरसदन की बिजली गुल हो गई। वहीं टूटी कुर्सियां भी परेशान करने में पीछे नहीं रहीं। हालांकि मुशायरे के श्रोताओं की संख्या कवि सम्मेलन के मुकाबले कम रही ऐसे में श्रोताओं को खडे़ नहीं होना पड़ा।
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