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ग्लोबल हो ललित कला का पाठ्यक्रम

Agra Updated Mon, 28 Jan 2013 05:30 AM IST
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आगरा। ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में ललित कला के पाठ्यक्रम को भी ग्लोबल किए जाने की जरूरत है। इसे रोजगार परक बनाना होगा। साथ ही समसामयिक दृष्टिकोण से कई आयामों को इसमें जोड़ना होगा। फाइन आर्ट में नई तकनीकें शामिल होनी चाहिए तभी नई पीढ़ी जुड़ेगी।
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बैकुंठी देवी कन्या महाविद्यालय की ड्राइंग की विभागाध्यक्ष डॉ. साधना सिंह ने अंर्तराष्ट्रीय कान्फ्रेंस में ये बातें कहीं। कृति कला संस्थान द्वारा ‘फाइन आर्ट करिकुलम इन इंडियन यूनिवर्सिटीज’ विषय पर आगरा क्लब में दो दिवसीय कान्फ्रेंस आयोजित की गई।
इससे पूर्व कान्फ्रेंस के पहले सत्र का शुभारंभ प्रसिद्ध संतूर वादक पंडित भजन सोपारी ने किया। गेस्ट आफ आनर भातखंडे डीम्ड यूनिवर्सिटी, अन्य विशिष्ट लखनऊ की वीसी प्रो. श्रुति सदोलिकर, राजा मान सिंह तोमर संगीत विवि, ग्वालियर के वीसी प्रो. स्वतंत्र शर्मा, हर प्रसाद व्यवहार संस्थान के निदेशक डॉ. महेश भार्गव थे। संयोजिका प्रो. लवली शर्मा ने सभी का स्वागत किया।
प्रो. पंकज बाला ने पद्म भूषण आरसी मेहता ,जो अस्वस्थता के चलते कान्फ्रेंस में हिस्सा नहीं ले पाए, का की नोट पढ़ा गया। डीईआई के संगीत विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. सत्यभान शर्मा ने कहा कि यदि आधार अच्छा नहीं है तो कुछ भी करिए, हालात बदलने वाले नहीं है। समाज में संगीत के प्रति जागरूकता लानी होगी। डा. महेश भार्गव ने कहा कि संगीत का मनोविज्ञान से गहरा नाता है। एक पेपर साइकोलॉजी आफ म्यूजिक एंड आर्ट का भी होना चाहिए।
शाम को म्यूजिक कंसर्ट में भजन सोपारी के संतूर वादन ने सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। सोमवार सुबह 10:30 बजे से पहले सत्र की शुरुआत होगी।

तय हो सरकारी नीति
प्रसिद्ध संतूर वादक पंडित भजन सोपारी ने ललित कला की वर्तमान स्थिति पर बातचीत की। उन्होंने बताया कि आगरा में संगीत की समृद्ध विरासत बसती है। गुरु शिष्य परंपरा में ही संगीत जिंदा रहता है। यह अफसोस ही है कि घरानों के प्रति सरकारी नजरिया सीमित रहा। हम सभी को मिलकर काम करना होगा। सरकार के भरोसे आज संगीतज्ञ ही नहीं होते। हम म्यूजिक के क्षेत्र में उतने एवेन्यू क्रिएट नहीं कर पाए हैं। ललित कला को लेकर सरकारी नीति बनाने की जरूरत है। कलाकार की कद्र भी जरूरी है।

रॉक एंड रोल पर है जोर
बिहार की मधुबनी पेंटिंग को अमेरिका तक पहुंचाने वाली आर्ट प्रो. जॉन के शर्मा ने कहा कि ललित कला को लेकर वहां भी यही हालात हैं। मार्केटिंग के दौर में रॉक एंड रोल पर जोर है। हमारे एजूकेशन सिस्टम में ही खामियां हैं। मैं अपने विद्यार्थियों को स्टडी टूर पर लाई और हमने मधुबनी पेंटिंग के बारे में जाना। आज कई विद्यार्थी अमेरिका में मधुबनी पेंटिंग सीख रहे हैं।

आत्मा की भूख है कला
प्रो. श्रुति सदोलिकर ने कहा कि कला एक शास्त्र है, मनोरंजन का साधन नहीं। आत्मा की भूख है कला। ललित कला भी नई तकनीकों से जुड़ना चाहती है। अधिकारियों में कला के प्रति संवेदना होनी चाहिए। रिएलिटी शो में टैलेंट तो सामने आया है लेकिन वे लंबी रेस के घोड़े नहीं हैं।

उद्यमियों को देना होगा आश्रय
प्रो. स्वतंत्र शर्मा ने कहा कि पहले ललित कला को राज्याश्रय मिलता था। अब उद्यमियों को इसका संरक्षण करना होगा। सिर्फ सरकारी प्रयासों से कुछ नहीं होगा।

म्यूजिक म्यूजियम बने
कान्फ्रेंस में भाग लेने आए ईरान के मोहम्मद हिकमत ने बताया कि ईरान और अमेरिका के संगीत का गहरा रिश्ता है। आज संगीत में नये मेथड लाने चाहिए। हमें संगीत और समाज के रिश्ते को खोजना होगा। म्यूजिक म्यूजियम बनाए जाने चाहिए।
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