आठ महा, नौ कातिक नहइयै, तौ धुर बैकुंठ जइयै

Agra Updated Tue, 30 Oct 2012 12:00 PM IST
आगरा। उठौ किशन तड़कौ भयो.. नहावे की बिरिया.. बार-बार मत बोलो मेरी माता नैनन नींद भरी... बड़ी बूढ़ी जे भजन उठामती जाती, सोई सब जग जातीं। छोटी, बड़ी सब इकट्ठी हैके जमुना जी कूं चल देतीं। हरि के भजन गामते जाते, कैसो आनंद बरसतौ बीबी, बाकी कही नाय जा सकै।
भयो प्रभात, बजाई हरि ने बांसुरी, सुनकै बंसुरिया की टेर, जगाई बिरज ग्वालिनी.. गाकै जमुना जी कूं जगाते। ऐसो कहौ जातौ है कि आठ महा, नौ कातिक नहइयै, तौ धुर बैकुंठ जइयै। धीरै-धीरै भजनऊ गुम है गये और औरतन की टोली ऊ। आज पहला दिना हो पर कोऊ रौनक नाही। अब तौ जमुना जी ऊ मैली है गईं और अबकी औरतन मैं ऊ पहले सौ दम नाय रह्यो। ठंड में ठिठुरकै कोऊ नाय जावै। अपने पुराने दिनों को याद करती सिकंदरपुर गांव की 70 वर्षीय बिरमा देवी का चेहरा उजला उठा। आधुनिकता में शहर ही नहीं, गांवों से भी कातिक मास का उल्लास उड़न छू हो गया।
शरण पूर्णिमा से कार्तिक स्नान शुरू हो गया। सिकंदर पुर गांव में कुछ बच्चियां तड़के उठके स्नान को गईं। उसके बाद तुलसा जी की पूजा की। बड़ी बूढ़ियों को भी अपना दौर याद आ गया, जब वे टोली बनाती भजन गाती नाचती जमुना के तीर पहुंचती थीं। बिरमा देवी और राजेंद्री की जुबां पर भजन रटे हुए हैं। बोली कि बचपन ते नहाय रहे कातिक, दो साल पहलै ही छूटौ है। बिरमा बोलीं कि स्नान करकै तुलसा और सालिगराम की पूजा करौ करते। तुलसा महारानी नमो नमो.. । महीना भर एक बखत अलौनौ खाते।

कार्तिक मास का माहात्म्य
आस्था के मास कार्तिक का ब्रज में विशेष माहात्म्य है। यह महिलाओं का महोत्सव कहा जाता है। ब्रह्म बेला में कुंवारी लड़कियां, महिलाएं स्नान कर तुलसी सालिगराम की पूजा करती हैं। कुंवारी वर के लिये, ब्याही संतान व बुजुर्ग बैकुंठ के लिये एक मास तक आराधना करती हैं। एक महीने व्रत रख एक बेर अलौना खाना खाती हैं। कार्तिक पूर्णिमा तक यह उत्सव चलता है। देवोत्थान एकादशी पर तुलसी सालिगराम का ब्याह भी किया जाता है।

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