वो चांदनी रातें हमें सोने नहीं देतीं

Agra Updated Sun, 28 Oct 2012 12:00 PM IST
आगरा। शहर के लोगों के जेहन में आज भी ताजा हैं, अस्सी के दशक से पहले की चांदनी रातें। उन्हें याद कर आज भी लोग रात भर सो नहीं पाते हैं। जिक्र छिड़ा तो यादों का सिलसिला चल निकला। शरद पूर्णिमा की चमकी का मेला तीन दिन चलता था। ताजमहल के पास बाजार पूरी रात गुलजार रहता था। दीवानों की भीड़ इतनी होती थी कि ताज परिसर में पैर रखने को जगह नहीं मिलती थी। आधी रात के बाद लोग मीनारों और हर कोण से ताज के अप्रितम सौंदर्य को निहारते थे। अब तो बस यादें ही बाकी हैं उस दौर की।
मलको गली के समाजसेवी मिर्जा सरदार बेग ने बताया कि उस दौर में ताजमहल पर कोई बंदिश नहीं थी। लक्खी मेला लगता था शरद पूर्णिमा को। पुरानी मंडी से ही फड़ और दुकानें लग जाती थीं। पूरी रात बाजार खुलता और लोग ताजमहल के अंदर बैठ, पूरी रात गुजार देते थे, इस अद्भुत नजारे को देखने वालों को चैन नहीं आता था। मेले के लिए बेरिकेडिंग लगाई जाती थीं। अब तो यादें रह गई हैं।
ताज के पूर्वी गेट पर रहने वाले सरदार बरकत सिंह छाबड़ा बोल, अरे वो जमाना अलग था। शरद पूर्णिमा पर लगने वाले मेले को देखने के लिए आसपास के शहरों से लोग आते थे। हम रिश्तेदारों को बुलाते थे। मुसाफिरों की बसें ताज के अंदर खड़ी होती थीं। जलेबियों के फड़ों पर लोगों की भीड़ जुटती थी। ताज की चमकी देखने वाले पूर्वी गेट से प्रवेश करते थे और उन्हें लेबर गेट से निकाला जाता था। यहां स्लीपरों की सीढ़ियां बनाई जाती थीं। वे बताते हैं कि शरद पूनो ही नहीं ईद, दशहरा और जैन समाज के लोग अनंत चौदस भी ताज में मनाते थे। इन मौकों पर मेले लगते थे। उन्होंने कहा कि वह पूरी रात ताज में गुजार देते थे।
ताजगंज के पीतम सिंह अरोड़ा का कहना है कि पहले जैसा भाईचारा रहा, न पहले जैसी अलमस्ती। उस दौर में हम ताज के दरवाजे खुद बंद करके आते थे। बचपन ताज के भीतर ही बीत गया। कई दफा तो रात को वहीं सो जाते थे। चमकी के मेले में टोल के टोल आते थे। चांदनी में नहाये ताज को उसके भीतर जाकर ही समझा जा सकता है। लफ्जों से परे है उस दौर की चमकी को बताना।
अमन कमेटी के संचालक मुनव्वर अली ने कहा ‘मेरा गरीबखाना क्या खुशनसीब है, ताजमहल के बिल्कुल करीब है।’ उन्होंने बताया कि रात दो बजे जब चांद पूरे शबाब पर होता था, तब ताज के दरोदीवारों से निकलने वाली किरणें सम्मोहित कर लेती थीं।
पाक टोला के हाजी अब्दुल अजीज खान बोले कि मेले में प्याऊ लगाए जाते थे। ताज परिसर में लोहे का सामान बिका करता था। बैलगाड़ियों से भी लोग ताज निहारने आते थे।

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