‘टेसू की गइया... बिकन बटेश्वर जाए’

Agra Updated Sun, 28 Oct 2012 12:00 PM IST
बाह। टेसू की गइया कच पेदरया, असीडला भुस खाय, सात समुंदर पानी पिये, बिकन बटेश्वर जाय... जैसे गीत शायद आपके बचपन की यादें ताजा कर दें। ये गीत भदावर क्षेत्र के अब गली मुहल्लों में सुनाई दे रहे हैं। बच्चों की टोलियां टेसू हाथ में थामे घर घर में भदावरी अंदाज में बृज भाषा की गीत गाकर महाभारतकालीन परंपरा को निर्वहन कर रहे हैं।
महंगाई के दौर में भी लागत मूल्य पर टेसू झांझी को बेच कर अपना धर्म निभा रहे हैं। जरार के रामदास ने बताया कि लागत मूल्य पर टेसू झांझी बेचकर उन्हेें आत्म संतुष्टि मिलती है। 50 पैसे के टेसू-झांझी के दौर के गवाह रहे राम सेवक ने बताया कि आजकल झांझी पांच से 10 रुपये में और टेसू 10 से 15 रुपये में बिक रहे हैं। पिनाहट, जरार, भदरौली, नहटोली, शाहपुरा गूजर, चित्राहट आदि इलाकों की गलियों घराें में टेसू झांझी के गीत गूंज रहे हैं। विभिन्न तीज त्योहारों की परम्पराएं भले ही रस्मों में सिमट गई हों लेकिन टेसू झांझी की परम्परा देहात में आज भी जिंदा है।
वहीं फतेहाबाद में नवरात्र के आखिरी दिन से टेसू-झांझी के गीत गूंज रहे हैं। शाम को बच्चे इनकी दीपों को जलाकर पूजा अर्चना करते हैं तथा शरद पूर्णिमा के दिन इनका विसर्जन करते हैं। अंबेडकर चौक से बस स्टैंड तक सड़क किनारे पर इनका बाजार लगा हुआ है। यहां 50-50 रुपये तक के टेसू-झांझी बिक्री के लिए लाए गए हैं।

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