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‘राम’ की आंखों से देख रहे ‘रहीम’

Agra Updated Sun, 26 Aug 2012 12:00 PM IST
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केस स्टडी :
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मूल रूप से बलिया के रहने वाले ‘रहीम’ (परिवर्तित नाम) की चोट लगने से आंखों की रोशनी चली गई। अपने परिचित से मिलने के लिए आगरा आए। यहां कॉर्निया ट्रांसप्लांट के बारे में जानकारी हुई। एसएन की आई बैंक में अपना नाम दर्ज कराया। एक दिन फोन पर ट्रांसप्लांट के लिए बुलाया गया। ‘रहीम’ को नेत्रदान से मिली किसी ‘राम’ (परिवर्तित नाम) की कॉर्निया ट्रांसप्लांट की गई। अब ‘राम’ की आंखों से ‘रहीम’ की अंधेरी जिंदगी में रोशनी लौट आई है।

आगरा। कौमी एकता की यह बानगी भर है। तमाम रहीम, एसएन मेडिकल कालेज की आई बैंक में नेत्रदान कर रहे राम की आंखों से देख पा रहे हैं। समाजसेवी संगठनों की पहल से नेत्रदान करने वालों की संख्या बढ़ रही है। मृत्यु के बाद अनमोल आंखों से किसी की अंधेरी जिंदगी में उजाला हो सके, इसके लिए अभी भी नेत्रदान करने वालों की दरकार है। शनिवार से शुरू हुए राष्ट्रीय नेत्रदान पखवाड़ा में शहरवासियों को प्रोत्साहित किया जाएगा।
मेडिकल कालेज के नेत्र रोग विभाग में वर्ष 2006-07 में आई बैंक स्थापित किया गया था। इसके बाद से साल दर साल नेत्रदान करने वालों की संख्या बढ़ रही है। पिछले दो सालों से हर साल 80 से 90 नेत्रदान हो रहे हैं।

नेत्र दान करने वालों की संख्या : 400 (2006-07 से 2012)
कॉर्निया ट्रांसप्लांट के लिए वेटिंग : 250
यूपी में आई डोनेशन बैंकों की संख्या : 50
एसएन आई डोनेशन बैंक : प्रदेश में तीसरा स्थान

ऐसा होता है नेत्रदान
मृत्यु होने पर नेत्रदान के लिए हेल्प लाइन नंबर 1919 पर फोन करने पर एसएन से डॉक्टरों की टीम पहुंचती है। टीम कॉर्निया को आई बैंक में लाकर प्रिजर्व कर लेती है। जांच में कॉर्निया सही पाए जाने पर ट्रांसप्लांट की लिस्ट से वेटिंग के हिसाब से कॉल कर रजिस्ट्रेशन करने वालों को बुलाया जाता है।

ये बरतें सावधानी
- मृत्यु पश्चात आंखों को बंद कर दें।
- आंखों पर पानी की पट्टी रखें, पंखा बंद कर दें और खुले में शव को न रखें।
- चार से छह घंटे में कॉर्निया निकाल ली जानी चाहिए।

ये समाजसेवी संस्था आईं आगे
आगरा विकास मंच
हेल्प आगरा
क्षेत्र बजाजा कमेटी
लायंस क्लब
अखिल भारतीय महिला परिषद

अस्पतालों में मौत होने पर हो सकेगा नेत्रदान
भले ही शहर में नेत्रदान करने वालों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन इससे कम ही लोगों की आंखों की रोशनी लौट रही है। दरअसल, अधिकांश बुजुर्ग की मौत होने पर ही नेत्रदान हो रहा है। ऐसे में कॉर्निया स्वस्थ न होने पर ट्रांसप्लांट नहीं किया जाता है। आई बैंक के इंचार्ज डॉ. डीजे पांडे ने बताया कि मृत्यु होने पर शरीर के अंग किसी के काम आ सकते हैं। इसी भावना से लोग नेत्रदान से जुड़ रहे हैं। एसएन मेडिकल कालेज के साथ ही निजी अस्पतालों को नेत्रदान अभियान से जोड़ा जा रहा है। कम उम्र में एक्सीडेंट और बीमारी से हो रही मृत्यु में परिवारीजनों की सहमति से नेत्रदान किया जा सकेगा। इससे कॉर्निया ट्रांसप्लांट की संख्या बढ़ सकेगी।

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