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भ्रष्टाचार से लड़ने को पारदर्शिता आवश्यक: प्रो. सुंदर लाल

Agra Updated Wed, 22 Aug 2012 12:00 PM IST
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आगरा। भ्रष्टाचार पर इस समय देश में काफी बातें हो रही हैं। उच्च शिक्षा भी इसकी चपेट में है। सिस्टम कोई भी हो, जब तक उसे पारदर्शी नहीं बनाया जाएगा। भ्रष्टाचार का हल ढूंढना मुश्किल होगा। यह कहना है वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सुंदर लाल का।
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पूर्व में डॉ. बीआर अंबेडकर विश्वविद्यालय में गणित के प्रोफेसर रहे डॉ. सुंदर लाल ने ‘अमर उजाला’ से बातचीत में उच्च शिक्षा के गिरते स्तर, भ्रष्टाचार और प्रवेश, परीक्षा तथा मूल्यांकन प्रणाली पर चिंता जाहिर की। उन्होंने कहा कि सिस्टम को खुला होना चाहिए। एक विश्वविद्यालय में प्रवेश, परीक्षा और मूल्यांकन प्रणाली पारदर्शी होनी चाहिए। आजकल साइबर युग है। ऐसे में सब कुछ ओपेन किया जा सकता है। इसका सदुपयोग किया जाना चाहिए। जब वस्तुस्थिति सभी केसामने होगी तो गलत करने की गुंजाइश बहुत कम रहती है। शैक्षिक स्तर में आई गिरावट पर डा. लाल का कहना है कि हमें बदलाव की आवश्यकता है। आजकल मूल्यांकन के नाम पर समझिये कि घास काटी जा रही है। लाखों कापियां जांचनी होती है। सेंट्रल एवैल्यूएशन सिस्टम है। एक शिक्षक सैकड़ों कापियां एक दिन में जांचता है। रिजल्ट निकालने का प्रेशर रहता है। ऐसे में कापियों का उचित मूल्यांकन कैसे हो सकता है? सिर्फ खानापूर्ति होती है। यही हाल प्रवेश और परीक्षा का है। रही बात शिक्षा के स्तर मे गिरावट की तो शिक्षा के निजीकरण करते समय यह नहीं सोचा गया कि इसके नुकसान क्या-क्या हो सकते हैं। गली मोहल्लों में उच्च शिक्षा संस्थान खुले हैं। राजनीति का क्षेत्र हो या व्यापार। किसी भी क्षेत्र के धनपशुओं ने इसे व्यापार के तौर पर लिया और संस्थान खोल लिया। इनका शिक्षा के मूल्य उद्देश्यों से कोई लेना देना नहीं है। अधिक मुनाफा कमाने को कम वेतन पर अयोग्य शिक्षकों की भर्ती होती है। कागजों में कुछ और वास्तविकता कुछ और होती है। ऐसी स्थिति में गुणवत्तायुक्त अध्यापन कैसे संभव है?
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अलग हो रहे शिक्षा और संस्कार
आगरा। प्रो. सुंदर लाल का कहना है कि शिक्षा अपने संस्कारों से कट रही है। नए दौर में शिक्षण संस्थानों की अब सामाजिक जवाबदेही नहीं रही। अभी हाल में हरियाणा में एक महिला की मृत्यु और उसके राजनेता से संबंध का मामला प्रकाश में आया है। सच्चाई उसमें कुछ भी हो। लेकिन आप देखिए वहां शिक्षा की कमी नहीं कह सकते। महिला पढ़ी लिखी थी। बात संस्कारों की है। शिक्षा से जो संस्कार मिलने चाहिए, वह नहीं मिले। इसीलिए ऐसी घटनाएं पढ़े लिखे तबकों में होती है।

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