एसएन में ‘पंछी’ के सहमे-सहमे कदम

Agra Updated Tue, 07 Aug 2012 12:00 PM IST
आगर। एसएन मेडिकल कालेज में पहले दिन बैच 2012 के ‘पंछी’ सहमे-सहमे से पहुंचे। बालों में तेल, रेड रिबन, लाल मोजे और काले जूते। नाइंटी डिग्री पर झुककर सीनियरों का विश किया। प्रिंसिपल डॉ. एनसी प्रजापति ने जूनियरों को परिजनों के साथ बुलाया उन्हें कालेज के बारे में जानकारी दी। परिजनों ने भी परिसर में गंदगी सहित छात्र-छात्राओं के ड्रेस कोड पर सवाल किये। कालेज प्रशासन ने ड्रेस कोड से जूनियर छात्रों की पहचान होने का तर्क दिया। इसके साथ ही सीनियर द्वारा रैगिंग करने पर एंटी रैगिंग सेल में शिकायत करने की जानकारी दी।
चाय और कोल्ड ड्रिंक में उलझे
कैंपस में जूनियर और सीनियर के बीच चुहलबाजी का सिलसिला पहले ही दिन से शुरू हो जाता था। एक बार सीनियर के फरमान पर जूनियर कैंटीन में पहुंच गये। उन्हें चाय और कोल्ड ड्रिंक में से किसी एक को पीने का विकल्प दिया गया। अधिकतर ने चाय गरम पीने के डर से कोल्ड ड्रिंक को पीने का विकल्प चुना, लेकिन सीनियर भी कम नहीं थे उन्होंने स्ट्रा कोल्ड ड्रिंक के अंदर डाल कर मुंह ऊपर कर एक एक ड्राप पीने का आदेश दिया। तब समझ में आया सीनियर तो सीनियर ही होते हैं।
डॉ. एनसी प्रजापति, प्रिंसिपल एसएन, एमबीबीएस 1978 बैच
सीट पर उल्टा बैठकर देखी मूवी ( फोटो कॉमन में )
रैगिंग का उद्देश्य जूनियर्स को कालेज की रीतियों से अवगत करना और उनके साथ परिचय बढ़ाना है। अधिकांश छात्र पहली बार हास्टल में आते थे। परिजनों की तरह सीनियर ख्याल रखते थे। इससे सीनियर के प्रति सम्मान बढ़ता था। हां, समझाने का तरीका जरूर अलग होता था। एक बार हमारे बैच के छात्र-छात्राओं को सीनियर मूवी दिखाने ले गये। सभी को सीट पर उल्टा बैठने के निर्देश दिये गये। साथ ही कहा गया कि सुनकर ही स्टोरी को समझने के लिए अपने मन को एकाग्र करो।
डॉ. केके प्रूथी, सेवानिवृत्त एचओडी अस्थि रोग विशेषज्ञ, एमबीबीएस 1966 बैच
बंदर की आहट पर कर देते थे विश ( फोटो कॉमन में )
रैगिंग से सीनियर और जूनियर एक दूसरे को अच्छी तरह जान जाते थे। सीनियरों के मदद करने पर उनके प्रति सम्मान बढ़ता था। जूनियर के लिए सीनियर ग्रांड फादर और फादर होते थे। जूनियरों से डांस और गाने की प्रस्तुति कराई जाती थी। इससे सीनियर और जूनियर दोनों का ही इंटरटेनमेंट होता था। सीनियर के सम्मान में 90 डिग्री पर विश करना पड़ता था। आलम यह था कि बंदर की आहट पर सीनियर समझकर विश कर देते थे। कई बार तो मैस के लड़कों को भी विश कर दिया।
डॉ. सुरभि गुप्ता, असिस्टेंट प्रोफेसर, एमबीबीएस 1992 बैच
लेक्चर थिएटर में पहुंचे टपोरी स्टाइल ( फोटो कॉमन में )
50 से 60 जूनियर मेडिकल स्टूडेंट को रैगिंग के लिए बुलाया जाता था। इससे स्टूडेंट का आपस में भी परिचय होने के साथ मेलजोल बढ़ता था। सीनियर का रेस्पेक्ट करते थे तो बदले में पार्टी मिलती थी। रैगिंग विपरीत परिस्थितियों के लिए छात्रों का दिलोदिमाग मजबूत करती थी। ऐसे ही हमारे 30 स्टूडेंट के ग्रुप को सीनियर ने बाल बिखरे हुए, शर्ट बाहर निकली हुई, चप्पल पहनकर टपोरी स्टाइल में लेक्चर थिएटर में जाने का निर्देश दिया। सीनियर की बात मानी तो प्रोफेसर ने लताड़ लगाई।
डॉ. सुशील सिंघल, जेआर थर्ड, एमबीबीएस बैच 2003

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