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प्रदूषित हवा बना रही चिड़चिड़ा व झगड़ालू

Lucknow Updated Mon, 25 Feb 2013 05:30 AM IST
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लखनऊ। बाग बगीचों का शहर रहे लखनऊ की आबो-हवा बढ़ते प्रदूषण से बिगड़ती जा रही है। साल दर साल हवा में बढ़ते घुलनशील खतरनाक रसायन जहां दिल और सांस के रोगों से पीड़ितों का ग्राफ बढ़ा रहे हैं, वहीं वाहनों की बढ़ती संख्या व ध्वस्त होती यातायात व्यवस्था से बढ़ता शोर भी शहरवासियों को चिड़चिड़ा व झगड़ालू बना दोहरी मुसीबत पैदा करने लगा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने प्रदूषण के बढ़ते कुप्रभाव से लोगों की मानसिक सोच में खतरनाक बदलाव की जानकारी दी है।
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विशेषज्ञ मानते हैं कि शहरी इलाकों में वाहनों की बढ़ती संख्या, औद्योगिक विकास, पेड़ों की अंधाधुंध कटान ने प्राणवायु को जानलेवा स्तर तक पहुंचा दिया है। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टॉक्सिकोलॉजी रिसर्च की रिपोर्ट भी आबोहवा में घुलते धीमे जहर से आने वाले समय में पैदा होने वाले गंभीर संकट की तरफ इशारा करते हुए समय रहते इससे बचाव का सुझाव देती है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारी भी मानते हैं कि नियोजित शहरी विकास न होने के कारण अलीगंज, विकास नगर, इंदिरा नगर, गोमती नगर जैसे आवासीय इलाकों, चारबाग, आलमबाग, अमीनाबाद और चौक जैसे व्यावसायिक इलाकों और अमौसी औद्योगिक क्षेत्र में हवा की गुणवत्ता लगातार खराब हो रही है। घरेलू, व्यावसायिक और औद्योगिक इलाकों में रेस्पिरेबल पार्टिकुलर मैटर (आरएसपीएम) नेशनल एम्बिएंट एयर क्वालिटी स्टैंडर्ड (एनएएक्यूएस) के मानकों से अधिक पाया गया है। इसी तरह फाइन पार्टिकुल मैटर (पीएम) भी मानक से अधिक है, जबकि सल्फर-डाइ-ऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड निर्धारित सीमा से कम मिले। फाइन पार्टिकुल मैटर बीते तीन वर्षों में हवा में लगातार बढ़ रहा है। ध्वनि प्रदूषण भी अमौसी औद्योगिक एरिया को छोड़कर सभी जगह मानक से अधिक मिला। आरएसपीएम और अन्य भारी तत्व राजधानी की आबोहवा को प्रदूषित कर लोगों की मानसिक सोच में उग्रता व चिड़चिड़ापन बढ़ाने में सबसे अहम भूमिका निभा रहे हैं।

स्वास्थ्य व सोच दोनों पर प्रतिकूल असर
फाइन पार्टिकुलर मैटर मनुष्य के स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव डालता है। हवा में बढ़ती इन तत्वों की मात्रा दिल और सांस की बीमारियों से पीड़ित रोगियों का ग्राफ लगातार बढ़ा रही है। खासतौर से अस्थमा, ब्रांकाइटिस, प्रजनन एवं विकास, समय से पहले प्रसव होना आदि व्याधियों से लोगों को जूझना पड़ रहा है। इसके अलावा प्रदूषण के कारण फैलने वाले सल्फर डाइ ऑक्साइड, नाइट्रोजन डाई ऑक्साइडन, क्रोमियम, कैडमियम, लेड, सीसा, निकिल भी मानव स्वास्थ्य व सोच दोनों पर प्रतिकूल असर डाल रही है।
डॉ. डीसी गुप्ता, मुख्य पर्यावरण अधिकारी, यूपीसीबीसी

मानसिक रोगी भी बढ़ा रहा प्रदूषण
जिन चौराहों अथवा मागमार्गों पर वाहनों का शोर शराबा ज्यादा होता है, वहां रहने वाले मानसिक शांति न मिल पाने के कारण अनिद्रा के शिकार हो कर मानसिक रोगी बन रहे हैं। शोर के कारण हवा में घुलनशील कार्बन मोनोआक्साइड व अन्य हाइड्रो कार्बन इंसान के शरीर में जाकर शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को नुकसान पहुंचाने के साथ उनकी शांतिपूर्ण मानसिक सोच में भी बदलाव ला रहे हैं।
प्रो. एससी तिवारी, मानसिक रोग विशेषज्ञ

तंत्रिका तंत्र व रक्त विकार का भी खतरा
वाहनों से निकलने वाले धुएं से लेड की जो मात्रा हवा में घुल कर मानव शरीर में सांस लेेने से पहुंचती है, उससे कैंसर के साथ ही तंत्रिका तंत्र और रक्त संबंधी विकार पैदा होने का खतरा भी कई गुना बढ़ गया है। हवा में घुलनशील निकिल जहां कैंसर, वहीं कैडमियम फेफड़ों की बीमारी को बढ़ा रहा है।
डॉ. मनोज अग्रवाल, पीएमएस सेवा


बॉक्स ....

आवासीय क्षेत्रों में ध्वनि प्रदूषण (डेसीबल)
क्षेत्र दिन रात
अलीगंज 62.5 54.8
विकास नगर 64.3 56.1
इंदिरा नगर 66.8 58.3
गोमती नगर 63.4 52.6
नोट ... तय मानक 55 45

व्यावसायिक क्षेत्रों में ध्वनि प्रदूषण (डेसीबल)
चारबाग 72.8 66.9
आलमबाग 68.5 61.5
अमीनाबाद 70.1 54.6
चौक 71.2 58.8
अमौसी 73.7 65.2
नोट.... तय मानक 65.0 55.0

राजधानी के आवासीय क्षेत्रों में हवा में प्रदूषण की मात्रा
क्षेत्र आरएसपीएम पीएम एसओटू एनओटू
अलीगंज 317.1 100.2 16.9 37.2
विकासनगर 272.4 102.4 19.5 41.2
इंदिरानगर 263.0 133.5 22.8 49.1
गोमतीनगर 285.1 104.7 19.2 39.5

नोट- सभी आंकड़े माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर में हैं। नेशनल एम्बिएंट एयर क्वालिटी स्टैंडर्ड (एनएएक्यूएस) के अनुसार हवा में आरएसपीएम मानकों के अनुसार 100 माइक्रोग्राम, पीएम 60, सल्फर डाई ऑक्साइड 80 और नाइट्रोजन ऑक्साइड 80 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर होनी चाहिए। डब्लूएचओ के मानकों के अनुसार ये मात्रा क्रमश: 50, 25, 20 और 40 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर होनी चाहिए। यह आंकड़े वर्ष 2011-12 में जारी रिपोर्ट के आधार पर हैं।
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