राजनीति की परतें उधेड़ता ‘नीम का पेड़’

Lucknow Updated Sun, 17 Feb 2013 05:30 AM IST
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लखनऊ। डॉ. राही मासूम रजा का उपन्यास ‘नीम का पेड़’ दो पीढ़ियों की दास्तान का दस्तावेज है, जिसमें राजनीति का विद्रूप चेहरा मुख्य रूप से दिखाई देता है। उपन्यास में पतन का मंजर है तो आदर्श की तलाश को भी ढूंढने का प्रयास किया गया है। शनिवार को बाल संग्रहालय में डॉ. राही मासूम रजा साहित्य एकेडमी की ओर से आयोजित ‘नीम का पेड़’ विषयक परिचर्चा में ये बातें साहित्यकार कुमार कार्तिकेय ने कही। एकेडमी के महामंत्री राम किशोर ने कहा कि राही ने राजनीति की तमाम बदबूदार, खोखली दगाबाजी भरी झूठी और दिखावटी परतों को धारदार तरीके से उधेड़ कर सामने रखा है। उपाध्यक्ष डॉ. ऊषा राय ने कहा कि राही में देश के बंटवारे का बहुत दुख था और वे इस दुख को मौका मिलते ही प्रकट कर देते थे। नीम का पेड़ इसकी मिसाल है। वहीं, भगवान स्वरूप कटियार ने कहा कि राही का उपन्यास समाज की विसंगतियों को अत्यंत धारदार और तेजाबी तरीके से प्रकट करता है। डॉ. सादिया सिद्दीकी ने कहा कि इसमें इंसानी फितरत के साथ उसकी चाल बाजियों को भी दिखाया गया है। रचनाकार मो. एहसन ने कहा कि खानदानी अदावत किस प्रकार समाज को प्रदूषित करती हैं, राजनीति में व्यक्तिगत हित किस प्रकार सामाजिक हितों पर हावी हो जाते हैं ‘नीम का पेड़’ में यह सब बखूबी बताया गया है। परिचर्चा की अध्यक्षता कर रही वंदना मिश्र ने कहा कि राही जिस प्रकार के भारतीय समाज की कल्पना करते थे अपने लेखन में उन्होंने उसको बखूबी बेबाक तौर पर पेश भी किया। परिचर्चा में वरिष्ठ नाट्यकर्मी मृदुला भारद्वाज, कहानीकार नसीम साकेती, अखिलेश श्रीवास्तव, कल्पना पाण्डेय, अरुणा सिंह, विजयराज बली माथुर समेत तमाम साहित्य अनुरागी और विचारकों ने विचार दिए।
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